पावर और पैसा’: क्या सिर्फ रसूखदारों के लिए धड़कता है मध्य प्रदेश का प्रशासनिक तंत्र?

वल्लभ भवन की चौखट तक पहुंची भ्रष्टाचार की जड़ें; छोटे उद्यमी फाइलों के बोझ तले दबे, केवल प्रभावशाली चेहरों को मिल रही तवज्जो।

भोपाल। मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में नीति, नियम और मेरिट की जगह अब एक नया अघोषित प्रोटोकॉल हावी हो चुका है—‘जिसके पास रसूख और साधन, काम उसी का तुरंत।‘ आज स्थिति यह बन चुकी है कि मंत्रालय (वल्लभ भवन) की चौखट से लेकर जिला स्तर तक फैला भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर का लेन-देन नहीं रहा, बल्कि यह व्यवस्था की एक गंभीर कार्यशैली में तब्दील हो चुका है। सत्ता के शीर्ष दफ्तरों की निगरानी के दावों के बावजूद सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूरी व्यवस्था अवसरवादिता और मिलीभगत के सांचे में ढल चुकी है? यदि कोई साधारण व्यक्ति किसी परियोजना का प्रस्ताव लेकर तीन से चार अधिकारियों से संपर्क करे, तो काम स्वीकृत हो या न हो, यह दुष्प्रचार अवश्य फैला दिया जाता है कि उक्त व्यक्ति की वित्तीय साख या लेन-देन संदिग्ध है। तत्पश्चात अन्य अधिकारियों के मध्य भी एक नकारात्मक धारणा बना दी जाती है, जिससे मध्य प्रदेश का वह छोटा और स्थानीय व्यवसायी कार्य करने से वंचित रह जाए।

दोहरे मानकों में जकड़ी नौकरशाही

प्रदेश की नौकरशाही पर नजर डालें तो तंत्र स्पष्ट रूप से दो भागों में बंटा दिखाई देता है। एक तरफ वे गिने-चुने निष्पक्ष और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी हैं जो व्यवस्था को नियम अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी आवाज इस विशालकाय तंत्र में हाशिए पर धकेल दी जाती है। दूसरी तरफ वह बहुसंख्यक वर्ग है जो केवल दो ही मापदंड पहचानता है—पॉलिटिकल बैकअप और आर्थिक प्रभाव। यदि आपके पास शक्ति और साधन हैं, तो नीतियां रातों-रात लचीली हो जाती हैं और मंजूरियां घंटों में जारी कर दी जाती हैं। अनेक अवसरों पर किसी परियोजना की उपयोगिता या प्रभावशीलता उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती, जितना कि उसके पीछे धनबल और सत्ता–प्रभाव का होना।

स्टार्टअप्स और छोटे व्यापारियों का दम घोंटती लालफीताशाही

इस पूरे गठजोड़ का सबसे घातक असर प्रदेश के नए, छोटे और मध्यम दर्जे के उद्यमियों पर पड़ रहा है। प्रदेश में कई ऐसे युवा और व्यापारी हैं जिनके पास 100% व्यावहारिक, नवाचारी और रोजगार पैदा करने वाले प्रोजेक्ट्स हैं। वे महीनों, कई बार सालों तक दफ्तर-दर-दफ्तर अपनी फाइलों को लेकर चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन उन्हें मिलता है तो सिर्फ:

· अनावश्यक आपत्तियां और क्वेरीज़: फाइलों को एक टेबल से दूसरी टेबल तक घुमाने की अंतहीन प्रक्रिया।

· संसाधनों की बर्बादी: बिना प्रभाव वाले उद्यमियों को तकनीकी रूप से सक्षम होने के बावजूद नजरअंदाज करना।

· निराशा और पलायन: जमीन पर काम करने की इच्छा रखने वाला युवा उद्यमी अंततः हताश होकर अपने प्रोजेक्ट्स दूसरे राज्यों में ले जाने को मजबूर हो जाता है।

सत्ता, सियासत और अफसरशाही का मौन समझौता

आश्चर्य इस बात का है कि चाहे मुख्यमंत्री जी हो या मंत्री हों या प्रशासनिक शीर्ष नेतृत्व, भ्रष्टाचार की इस गहरी होती बीमारी से कोई अनजान नहीं है। कागजों पर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस‘ और ‘सिंगल विंडो सिस्टम‘ के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर बिना लेन-देन और राजनीतिक पहुंच के एक साधारण एनओसी हासिल करना भी टेढ़ी खीर बना हुआ है। जब भ्रष्टाचार के तार शीर्ष स्तरों के इर्द-गिर्द घूमते दिखें, तो जनता और छोटे व्यापारियों का भरोसा सीधे लोकतांत्रिक व्यवस्था से टूटने लगता है।

बड़ा सवाल, कब बदलेगी यह मानसिकता?

यदि मध्य प्रदेश को वास्तव में आत्मनिर्भर और औद्योगिक रूप से अग्रणी बनाना है, तो नौकरशाही के इस अवसरवादी रवैये पर कठोर अंकुश लगाना होगा। जब तक किसी प्रोजेक्ट की सफलता उसकी योग्यता और जनहित से तय न होकर, निवेशक की राजनीतिक व आर्थिक पहुंच से तय होगी, तब तक विकास केवल रसूखदारों की तिजोरियों तक ही सीमित रहेगा। अब वक्त आ गया है कि व्यवस्था यह तय करे कि वह 8 करोड़ जनता के सपनों के साथ खड़ी है या केवल प्रभावशालियों के सिंडिकेट के साथ।

 

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