
भोपाल: उर्दू शायरी को अपनी सादगी और संजीदगी से आम अवाम के दिलों तक पहुंचाने वाले महान शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। लंबी बीमारी से जूझ रहे 91 वर्षीय बशीर बद्र साहब ने बृहस्पतिवार को भोपाल स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके परिजनों ने इस दुखद खबर की पुष्टि की है। उनके निधन से साहित्य और कला जगत में एक अपूरणीय क्षति हुई है और देश-विदेश में मौजूद उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रख्यात गीतकार जावेद अख्तर सहित कई बड़ी हस्तियों ने उनके इंतकाल पर गहरा दुख जताया है।
शिमला समझौते से लेकर आम जिंदगी के फलसफे तक, कालजई रचनाओं के रहे रचनाकार
बशीर बद्र साहब की लेखनी में वो जादू था जो राजनीति से लेकर इंसान के जज्बातों को बेहद सहज शब्दों में बयां कर देता था। वर्ष 1972 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक शिमला समझौता हो रहा था, तब बद्र साहब ने एक कालजई शेर लिखा था— “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हों।” इसके अलावा उनके कई शेर जैसे, “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता”, “लोग टूट जाते हैं एक मकां बनाने में, वो तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” और “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए” आज भी लोगों की जुबान पर हर खास-ओ-आम मौके पर गूंजते हैं।
जावेद अख्तर बोले- ‘आज हमारी उर्दू भाषा और गरीब हो गई’
बशीर बद्र के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए देश के जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बेहद भावुक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा, “आज हमारी भाषा उर्दू और गरीब हो गई है। एक अत्यंत मधुर कवि, बशीर बद्र हमारे बीच से हमेशा के लिए विदा हो गए हैं। उनकी गज़लें और उनकी शायरी हमेशा हमारी यादों में जीवित रहेगी।” जानकारों के मुताबिक, बद्र साहब की गजलों में मीर तकी मीर जैसी सादगी और समकालीन उर्दू का ऐसा बेहतरीन तालमेल होता था जिसे कोई भी आसानी से समझ और सराह सकता था।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से रहा गहरा नाता, सय्यद मुहम्मद बशीर था असली नाम
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था। उन्होंने महज सात साल की उम्र से ही शेर-ओ-शायरी लिखना शुरू कर दिया था। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में उर्दू के शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। वे न सिर्फ उर्दू बल्कि फारसी, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं के भी गहरे जानकार थे। उन्होंने अपनी शायरी में उर्दू की कोमलता को इस तरह पिरोया कि वह दुनिया भर में मकबूल हो गए।
मेरठ के दंगों में जल गया था आशियाना, भोपाल को बनाया नया घर
बशीर बद्र का जीवन संघर्षों से भरा रहा। अप्रैल 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उपद्रवियों ने उनका घर जला दिया था। इस त्रासदी में उनकी बरसों की मेहनत और कई अप्रकाशित अनमोल रचनाएं जलकर राख हो गईं। इस गहरे सदमे के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करने के लिए वे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आ गए और यहीं के होकर रह गए। इस घटना ने उनके भीतर की संवेदनाओं को और गहरा किया, जो बाद में उनकी शायरी में साफ नजर आया।
पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से हुए सम्मानित
बशीर बद्र साहब की साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें चार बार उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, एक बार बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार और प्रतिष्ठित मीर अकादमी पुरस्कार समेत देश-विदेश के अनगिनत सम्मानों से विभूषित किया गया। उन्होंने ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आस’, ‘आसमान’ और ‘आहट’ जैसे सात से अधिक उर्दू कविता संग्रह और देवनागरी लिपि में ‘उजाले अपनी यादों के’ शीर्षक से हिंदी में भी संग्रह प्रकाशित किए। उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच और गुजराती जैसी भाषाओं में भी हुआ। बशीर बद्र अपने पीछे पत्नी और दो बच्चों सहित लाखों चाहने वालों का रोता हुआ परिवार छोड़ गए हैं।
ब्रांणवाणी टीम की तरफ से बशीर बद्र साहब को शत शत नमन
“यूं गले मिलो न तपाक से, कोई हाथ भी न मिलाएगा, तुझे क्या ख़बर है कि इस तरह, कोई कितना तन्हा छोड़ जाएगा,” डॉ. बशीर बद्र
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