क्या सिस्टम पर भारी है ‘उज्जैन कनेक्शन’? मंत्री और अपर मुख्य सचिव के आदेश भी बेअसर?

भोज यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार का ‘रसूख’: तबादला सूची से दो बार गायब हुआ नाम, आखिर कौन है असली पावर सेंटर

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में इन दिनों एक ही चर्चा जोरों पर है— क्या सरकार के रसूखदार मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों से भी ऊपर कोई ‘अदृश्य शक्ति’ काम कर रही है?

मामला भोज मुक्त विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. सुनील मंदेरिया से जुड़ा है, जिनका दबदबा ऐसा है कि उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और अपर मुख्य सचिव (ACS) अनुपम राजन जैसे कद्दावर नाम भी उनके आगे ‘बोने’ साबित हो रहे हैं।सूत्रों के मुताबिक, विभाग ने रजिस्ट्रार के स्थानांतरण की तैयारी पूरी कर ली थी। मंत्री और अपर मुख्य सचिव की सहमति से दो बार ट्रांसफर लिस्ट में उनका नाम जोड़ा गया, लेकिन जैसे ही फाइल मुख्यमंत्री सचिवालय (CMO) पहुंची, वहां से रजिस्ट्रार का नाम रहस्यमयी ढंग से हटा दिया गया। अब गलियारों में सवाल तैर रहा है कि क्या विभाग के मुखिया और नीति निर्धारकों की ताकत केवल कागजों तक सीमित है?प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि रजिस्ट्रार खुलेआम अपने ‘उज्जैन कनेक्शन’ का हवाला देते हैं। सूत्रों का कहना है कि रजिस्ट्रार का यह आत्मविश्वास कि *”मैं उज्जैन का रहने वाला हूं और मुख्यमंत्री से मेरी निकटता किसी से छिपी नहीं है”*, सीधे तौर पर प्रशासनिक अनुशासन को चुनौती दे रहा है। यदि एक विश्वविद्यालय का अधिकारी खुद को विभाग के मंत्री और ACS से ऊपर मानने लगे, तो क्या विभाग को आसानी से चलाया जा सकता है?

भोज विश्वविद्यालय पहले से ही विभिन्न विसंगतियों और विवादों के लिए चर्चा में रहा है। जब विभाग के सर्वेसर्वा ही असहाय महसूस करने लगें, तो लोकायुक्त और EOW जैसी संस्थाओं से क्या उम्मीद की जाए? ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति केवल छोटे कर्मचारियों के लिए है?

प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन, जो अपनी प्रशासनिक पकड़ और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं, उनके सामने यह एक बड़ा सवालिया निशान है। क्या यही वह ‘जीरो टॉलरेंस’ है जिसका वादा सरकार ने किया था? बड़ा सवाल: क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने नाम का उपयोग कर विभाग को ठेंगा दिखाने वाले ऐसे अधिकारियों पर नकेल कसेंगे? प्रशासनिक संकट: यदि हर उज्जैन का व्यक्ति खुद को मुख्यमंत्री के नाम से विभाग से ऊपर समझने लगेगा, तो सिस्टम में सुधार की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।यह केवल एक ट्रांसफर का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकार की साख और प्रशासनिक इकबाल का मामला है। यदि मुख्यमंत्री इस पर कड़ा संज्ञान नहीं लेते हैं, तो भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने राजनीतिक रसूख के दम पर व्यवस्था को बंधक बना लेगा। देखना होगा कि मुख्यमंत्री इस ‘धौंस’ को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

ब्रांडवाणी समाचार डेस्क

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

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