
भोपाल। राजधानी भोपाल स्थित भाजपा के प्रदेश कार्यालय में सजे हजारों दीयों की लौ जलने से पहले ही तेज बारिश में बुझ गई। दीयों में तेल की जगह पानी भर गया और इसी के साथ सत्ता के उस भारी-भरकम ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की हकीकत भी धुल गई, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन और ‘सेवा संकल्प अभियान’ के नाम पर प्रदेशभर में प्रचारित किया जा रहा था। मध्य प्रदेश में 17 सितंबर की शाम 7 बजे एक साथ 58 लाख से अधिक ‘आशीर्वाद के दीपक’ जलाने का दावा था, लेकिन कुदरत के एक झोंके ने यह दिखा दिया कि जनता के पैसे से रचा गया आडंबर कितना खोखला है।

भारतीय परंपरा में जलने से पहले ही दीये का बुझ जाना और उसमें पानी भर जाना किसी भी दृष्टिकोण से शुभ नहीं माना जाता। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस स्तर के फिजूलखर्च और चाटुकारिता वाले दिखावे से खुश होंगे? या फिर सत्ता की इस चमक-दमक के पीछे जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है? सबको अपनी सत्ता बचाना है तो चाटुकारिता करना ही है।


करोड़ों का तेल-दीया या युवाओं का भविष्य? मध्य प्रदेश में हफ्तों और महीनों तक चलने वाले इस ‘जन्मदिन महोत्सव’ पर सरकारी और दलगत तंत्र जिस तरह बेहिसाब धन बहा रहा है, उसकी सीधी तुलना राज्य के आर्थिक यथार्थ से की जानी चाहिए।
- स्टार्टअप और रोजगार: 58 लाख दीयों, लाखों लीटर खाद्य/दीपक तेल और पूरे राज्य में लगे प्रचार तंत्र पर होने वाले करोड़ों रुपये के खर्च से राज्य के सैकड़ों होनहार युवाओं को ‘सीड फंडिंग’ (शुरुआती पूंजी) दी जा सकती थी। इससे न केवल दर्जनों नए उद्यम खड़े होते, बल्कि हजारों बेरोजगार युवाओं को स्थायी रोजगार मिलता।
- गरीबों की रसोई: महंगाई के इस दौर में जहां आम परिवार के लिए सरसों और सोयाबीन तेल खरीदना दूभर हो रहा है, वहां लाखों लीटर तेल को केवल एक शाम के इवेंट के नाम पर सड़कों और मैदानों में बहा देना सीधे तौर पर जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। यदि यही संसाधन जरूरतमंद परिवारों और कुपोषित बच्चों तक पहुंचते, तो प्रधानमंत्री को जनता के दिलों से सच्ची दुआ मिलती।
‘सरकार‘ या ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी‘? डॉ. मोहन यादव की सरकार और प्रदेश भाजपा संगठन की कार्यशैली पर अब यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या यह तंत्र एक लोक-कल्याणकारी सरकार के रूप में काम कर रहा है या फिर किसी ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ की तरह, जिसका एकमात्र उद्देश्य इवेंट मैनेज करना, सुर्खियां बटोरना और विज्ञापनों के जरिए अपनी साख चमकाना रह गया है।


प्रदेश के कई हिस्सों में बाढ़ और जलभराव से किसान और आम नागरिक त्रस्त हैं, युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं, लेकिन सत्ता का शीर्ष नेतृत्व केवल हाई-प्रोफाइल आयोजनों में व्यस्त है। प्रशासन से लेकर तंत्र के कई हिस्सों तक को इस तरह साध लिया गया है मानो आलोचना की कोई गुंजाइश ही न बचे। धनबल और सत्ता के रसूख के बूते सब कुछ ‘मैनेज’ कर लेने का अहंकार साफ नजर आता है।
ब्रांडवाणी का सीधा सवाल ‘ब्रांडवाणी’ निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के तहत यह सवाल सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचाता है, क्या देश के प्रधानमंत्री तक मध्य प्रदेश की यह असल तस्वीर पहुंचेगी? अगर हमारी पत्रकारिता में एक भी शब्द सच है, तो क्या प्रधानमंत्री इस अंधाधुंध फिजूलखर्ची और दरबारी संस्कृति पर संज्ञान लेकर मुख्यमंत्री और संगठन से जवाब तलब करेंगे? जनता को कागजी दावों और बुझते दीयों का तमाशा नहीं, रोजगार, राहत और जवाबदेही चाहिए।






