‘भ्रष्टाचार का दलदल’: मध्य प्रदेश में पिछले 20 वर्षों में भ्रष्टाचार का ग्राफ़

आज हम बात करेंगे उस राज्य की जिसे ‘हृदय प्रदेश’ कहा जाता है, लेकिन बीते दो दशकों में यहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हुई हैं, इसे लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट्स चौंकाने वाले खुलासे कर रही हैं। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान भ्रष्टाचार का स्तर क्या रहा है और क्या यह वाकई एक ‘सिस्टम’ बन चुका है? आइए देखते हैं हमारी इस विशेष रिपोर्ट में।

रिपोर्ट के मुख्य अंश: भ्रष्टाचार का बढ़ता आंकड़ा

  1. वैश्विक और राष्ट्रीय रिपोर्ट्स का क्या है कहना?

वैश्विक संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) की विभिन्न समय की रिपोर्ट्स और ‘इंडिया करप्शन सर्वे’ के अनुसार, मध्य प्रदेश लगातार उन राज्यों की सूची में ऊपरी पायदान पर रहा है जहाँ नागरिकों को सरकारी सेवाओं के लिए रिश्वत देनी पड़ती है।

2003-2008 (प्रथम कार्यकाल): इस दौरान भ्रष्टाचार का स्तर संगठित नहीं था, लेकिन स्थानीय स्तर पर ‘लालफीताशाही’ हावी थी। सर्वे के अनुसार लगभग 30% से 35% लोगों ने माना था कि उन्हें छोटे कार्यों के लिए भी रिश्वत देनी पड़ी।

2008-2013 (द्वितीय कार्यकाल): इस पंचवर्षीय में ‘व्यापम’ (Vyapam) जैसे बड़े घोटालों की नींव पड़ी। भ्रष्टाचार का स्तर बढ़कर 45% के पार पहुँच गया। इसी दौरान लोकायुक्त की कार्रवाई में क्लर्कों के घर से करोड़ों की संपत्ति मिलने के मामले सुर्ख़ियों में आए।

2013-2018 (तृतीय कार्यकाल): यह दौर घोटालों का चरम माना जाता है। व्यापम कांड के खुलासे ने मध्य प्रदेश की छवि वैश्विक स्तर पर खराब की। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भ्रष्टाचार का प्रतिशत इस समय 55% से 60% तक पहुँच गया था, जिसमें शिक्षा और भर्ती प्रणाली पूरी तरह प्रभावित हुई।

2020-2026 (वर्तमान और पिछला कार्यकाल):हालिया डेटा और ADR (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट्स के अनुसार, अब भ्रष्टाचार ‘विकेंद्रीकृत’ हो चुका है। पटवारी भर्ती घोटाला और ई-टेंडरिंग जैसे मामलों ने भ्रष्टाचार के ग्राफ को 70% के खतरनाक स्तर तक पहुँचा दिया है।

  1. नेता बनाम अधिकारी: ज्यादा भ्रष्ट कौन?

‘ब्रांडवाणी’ के शोध के अनुसार, मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का एक ‘नेक्सस’ (गठजोड़) काम करता है।

अधिकारी: रिपोर्टों के अनुसार, जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार (रिश्वतखोरी) में अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका 60% रही है।

नेता: नीतिगत भ्रष्टाचार और बड़े ठेकों में नेताओं की संलिप्तता 40% है, लेकिन इनके द्वारा हड़पी गई राशि अधिकारियों की तुलना में कहीं अधिक बड़ी है।

सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार ‘अधिकारी-ठेकेदार-नेता’ के त्रिकोण ने किया है, जहाँ पैसा नीचे से ऊपर की ओर प्रवाहित होता है।

  1. बीजेपी शासन में भ्रष्टाचार के नए आयाम

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार अब केवल ‘पैसे के लेन-देन’ तक सीमित नहीं है। इसमें शामिल हैं:

टेंडरिंग घोटाला: डिजिटल इंडिया के दौर में ई-टेंडरिंग में सेंधमारी।

निर्माण कार्य: पुलों और बांधों का बह जाना (जैसे कारम बांध की घटना)।

धार्मिक आयोजन: ‘महाकाल लोक’ में मूर्तियों के खंडित होने जैसे मामलों ने धार्मिक आस्थाओं के बीच भी भ्रष्टाचार के स्तर को उजागर किया है।

विशेष संपादकीय टिप्पणी (ब्रांडवाणी)

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार अब किसी एक विभाग की बीमारी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र का ‘डीएनए’ बन चुका है। वैश्विक रिपोर्ट्स संकेत देती हैं कि जब सत्ता लंबे समय तक एक ही हाथ में रहती है, तो जवाबदेही कम हो जाती है। ‘ब्रांडवाणी’ का मानना है कि यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो विकास की यह इमारत भ्रष्टाचार की दीमक से ढह सकती है।

यह थी हमारी विशेष पड़ताल। डेटा बताते हैं कि भ्रष्टाचार का प्रतिशत हर पाँच साल में औसतन 10-12% की दर से बढ़ा है। अब जनता को तय करना है कि वे ‘सुशासन’ के दावों को चुनते हैं या इन कड़वे आंकड़ों को।

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Gaurav Singh

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