एमपी के ‘सिस्टम’ में भ्रष्टाचार का ‘बाहरी’ मोह: अपनों के प्रस्ताव कूड़ेदान में, बाहरी दलालों के लिए बिछा है रेड कार्पेट?

भोपाल।मध्यप्रदेश के विकास का दावा करने वाली सरकार और प्रदेश को चलाने वाले नौकरशाहों ने अब एक नया और खतरनाक ‘शॉर्टकट’ ढूंढ लिया है। यह शॉर्टकट है— प्रदेश के व्यापारियों की बलि और बाहरी ‘सेटिंगबाज़ों’ की चांदी।** आज मध्यप्रदेश की प्रशासनिक गलियारों में हालात यह हैं कि यहाँ के मूल निवासियों और स्थानीय व्यापारियों के पास विज़न तो है, लेकिन उनके पास वो ‘सीक्रेट डील’ नहीं है जो साहबों को पसंद आए।

मध्य प्रदेश का व्यापारी ‘अछूत’, बाहरी लुटेरों से ‘पक्की’ सेटिंग

ब्रैंडवाणी समाचार के पास पुख्ता जानकारी है कि मंत्रालय से लेकर विभिन्न विभागों तक, मध्यप्रदेश के अनुभवी बिजनेसमैन और विजनरी युवाओं के प्रस्तावों को रद्दी के भाव कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है। स्थानीय उद्यमियों की सबसे बड़ी “गलती” यह है कि वे प्रदेश के प्रति जवाबदेह हैं और व्यवस्था की खामियों को उजागर कर सकते हैं।

इसके विपरीत, अधिकारियों और सफेदपोश नेताओं की पहली पसंद अब गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के वो बाहरी लोग बन चुके हैं, जो ‘लेन-देन’ के खेल में माहिर हैं। इन बाहरी लोगों को काम देने के पीछे का असली खेल यह है कि इनका प्रदेश से कोई लेना-देना नहीं होता, काम पूरा हो या न हो, नुकसान जनता का हो या सरकार का—साहब का कमीशन सुरक्षित रहना चाहिए।

क्यों डरे हुए हैं अधिकारी?

स्थानीय व्यापारियों को दरकिनार करने के पीछे सबसे बड़ा कारण ‘भ्रष्टाचार का पर्दाफाश’ होने का डर है। स्थानीय व्यापारी यहीं का रहने वाला है, वह व्यवस्था की रग-रग से वाकिफ है। अगर कोई अधिकारी उससे कमीशन मांगेगा, तो आज नहीं तो कल उसकी आवाज़ प्रदेश के गलियारों में गूंजेगी। वहीं बाहरी दलाल काम लेकर गायब हो जाते हैं, जिससे अधिकारियों का करप्शन फाइलों में ही दफन रह जाता है।

विनाशकारी प्रोजेक्ट्स को भी हरी झंडी

हैरानी की बात तो यह है कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति ऐसा प्रोजेक्ट लाता है जिससे प्रदेश के संसाधनों का नुकसान हो, तब भी अधिकारी उसे पलक-पावड़े बिछाकर स्वीकार कर लेते हैं। बस शर्त एक ही है— लेन-देन’ में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। प्रदेश के काबिल व्यापारियों के बेहतरीन और जनहितैषी प्रस्तावों पर धूल जम रही है, जबकि बाहरी मुनाफाखोरों के लिए नियमों को ताक पर रखकर रास्ते बनाए जा रहे हैं।

आखिर कब तक लुटेगा मध्यप्रदेश?

क्या मध्यप्रदेश के अधिकारियों के लिए ‘लोकल फॉर वोकल’ सिर्फ एक जुमला है?

स्थानीय व्यापारियों के प्रस्तावों को बिना पढ़े खारिज करने वाले अधिकारियों की संपत्ति की जांच क्यों नहीं होती?

बाहरी कंपनियों को प्राथमिकता देकर प्रदेश के राजस्व और भविष्य को दांव पर लगाने का अधिकार इन साहबों को किसने दिया?

सावधान रहिये!  इन भ्रष्ट गठजोड़ की हर एक फाइल को खोलने के लिए तैयार है। प्रदेश के हक की लड़ाई अब सड़कों से लेकर सत्ता के गलियारों तक लड़ी जाएगी।

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Gaurav Singh

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