
ब्रांडवाणी समाचार विशेष खुलासा, मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित में करोड़ों का फर्जीवाड़ा
भोपाल (मध्य प्रदेश) मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित एक बार फिर भ्रष्टाचार, लापरवाही और षड्यंत्र के बड़े भंवर में घिर गया है। पंजाब नेशनल बैंक द्वारा भेजे गए औपचारिक पत्र के माध्यम से एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा सामने आया है, जिसने विभाग के शीर्ष अधिकारियों से लेकर मंत्रालय तक हड़कंप मचा दिया है। मैसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड द्वारा जमा करवाई गई कुल 35.80 करोड़ रुपये (₹16.20 करोड़ एवं ₹19.60 करोड़) की दो बैंक गारंटियां (BG) सरासर फर्जी और कूटरचित पाई गई हैं। हैरानी की बात यह है कि बैंक द्वारा वर्ष 2023 में ही इस फर्जीवाड़े की पुष्टि करने के बावजूद विभाग ने न तो कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की, बल्कि उल्टे करोड़ों रुपये के बिल पास करके भुगतान जारी रखा गया।
कोलकाता ब्रांच से आया था खुलासा: PNB ने कहा—‘हमने ऐसी कोई BG जारी ही नहीं की‘
दस्तावेज़ के अनुसार, पंजाब नेशनल बैंक की बागुईआटी शाखा (तेघोरिया, हथियारा, कोलकाता-700157) ने संदर्भ संख्या: BO/BG/Baguiati/2023-2024, दिनांक 15-06-2023 को एक औपचारिक पत्र प्रोजेक्ट डायरेक्टर, मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित, 8, अरेरा हिल्स, जेल रोड, भोपाल को प्रेषित किया था।
यह पत्र जल निगम के पत्र क्रमांक 4708/Accounts/MPJNM/2023 दिनांक 24/03/2023 के संदर्भ में भेजा गया था, जिसमें मैसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड, इंदौर के मोबिलाइजेशन एडवांस हेतु जमा करवाई गई बैंक गारंटियों का सत्यापन (वेरिफिकेशन) मांगा गया था।
बैंक के शाखा प्रबंधक (Branch Incumbent) ने स्पष्ट शब्दों में लिखा:
- BG क्रमांक: 00159/BG/103910/2023 एवं 00157/BG/103910/2023
- जारी करने की तिथि: 20-03-2023
- BG की राशि: ₹16,20,00,000/- (सोलह करोड़ बीस लाख रुपये) एवं ₹19,60,00,000/- (उन्नीस करोड़ साठ लाख रुपये)
- कुल राशि: ₹35,80,00,000/- (पैंतीस करोड़ अस्सी लाख रुपये)
- वैधता तिथि: 31-01-2025 तक
बैंक ने अपनी मुहर और हस्ताक्षर सहित साफ तौर पर प्रमाणित किया:
“The following BG as per details mentioned with this letter has not been issued by Punjab National Bank BO Kolkata Baguiati Br… we certify that the above said BGs is not genuineness which is issued in favour of The Managing Director, Madhya Pradesh Jal Nigam Maryadit, Bhopal.”
(अनुवाद: इस पत्र में उल्लिखित विवरण के अनुसार बैंक गारंटी पंजाब नेशनल बैंक की कोलकाता बागुईआटी शाखा द्वारा जारी नहीं की गई है… हम प्रमाणित करते हैं कि प्रबंध संचालक, मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित, भोपाल के पक्ष में जारी उक्त बैंक गारंटियां असली नहीं हैं।)

पत्र दबाकर बिल पास किए गए, चार्टर्ड अकाउंटेंट भावना की भूमिका कठघरे में
बैंक का औपचारिक पत्र 15 जून 2023 को आने के बावजूद जल निगम के लेखा विभाग और वित्तीय प्रबंधन ने इस पर आश्चर्यजनक रूप से पर्दा डाल दिया।
- दस्तावेज़ दबाने का आरोप: बैंक की जांच रिपोर्ट आने के बाद सबसे पहली जिम्मेदारी लेखा विभाग और वहां पदस्थ चार्टर्ड अकाउंटेंट भावना की बनती थी कि वह तत्काल भुगतान रोकतीं, ऑडिट आपत्ति दर्ज करतीं और प्रबंध संचालक को फाइल भेजकर एफआईआर दर्ज करवातीं। लेकिन वही फाइल को दबा लिया गया।
- लगातार भुगतान का सिलसिला: आरोप है कि इस पत्र को फाइल के नीचे दबा दिया गया और मैसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड को लगातार आगे के बिल पास करके करोड़ों रुपये का भुगतान किया जाता रहा।
- डिग्री रद्द करने की मांग: एक पेशेवर सीए का मूल कर्तव्य वित्तीय अनियमितताओं को रोकना होता है। ऐसे में प्रश्न उठ रहा है कि क्या ICAI (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया) द्वारा उनका पंजीकरण निरस्त नहीं किया जाना चाहिए? क्या विभाग द्वारा उनके खिलाफ धोखाधड़ी, कूटसंरचना और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज नहीं होना चाहिए?
दोहरा रवैया, छोटी राशि पर निलंबन, 35.80 करोड़ पर खामोशी क्यों?
विभाग के दोहरे मापदंड पर भी तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं:
- कुछ समय पूर्व ₹2.5 करोड़ की बैंक गारंटी के मामले में दीपक रायचुरा को तत्काल प्रभाव से निलंबित (सस्पेंड) कर दिया गया था।
- वहीं दूसरी तरफ, जब मामला लगभग ₹35.80 करोड़ की विशालकाय धांधली का आया, तब पूरा विभाग खामोश बैठ गया।
- यह दोहरा चरित्र साफ दर्शाता है कि मामला सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार शीर्ष पदों तक जुड़े हुए हैं।
IAS अधिकारियों और मंत्रालय की चुप्पी पर गंभीर प्रश्न
ब्रांडवाणी समाचार के विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार:
- प्रबंध संचालक के.वी.एस. चौधरी (IAS): सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश जल निगम के प्रबंध संचालक के.वी.एस. चौधरी को इस पूरे मामले की सूचना मिले दो से तीन दिन बीत चुके हैं, किंतु अभी तक किसी भी दोषी पर न तो प्राथमिकी (FIR) दर्ज हुई है और न ही कोई विभागीय कार्रवाई की गई है। आखिर इस रहस्यमयी शांति के पीछे कौन सा खेल चल रहा है?
- अपर मुख्य सचिव सचिन सिन्हा (IAS): विभाग के प्रशासनिक मुखिया होने के नाते एसीएस सचिन सिन्हा की नाक के नीचे इतना बड़ा घोटाला दबा रहा। क्या उनके संज्ञान में यह दस्तावेज़ नहीं लाया गया, या फिर मंत्रालय स्तर पर भी मौन सहमति बनी हुई है?
- विभागीय मंत्री की जिम्मेदारी: जनता की गाढ़ी कमाई और केंद्र व राज्य सरकार के विकास कार्यों के बजट को इस प्रकार एक निजी कंपनी के हवाले कर दिया गया। क्या मंत्री महोदय कमीशन के प्रभाव में मौन हैं या आने वाले समय में कोई सख्त कदम उठाएंगे?
कूटरचित दस्तावेज़ और कानूनी पहलू, ED, CBI और EOW जांच की आवश्यकता
मैसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड के संचालक पर पहले से ही अन्य मामलों को लेकर कानूनी शिकंजा कसा जा चुका है और वह जेल भी जा चुका है। किंतु जल निगम के अंदर बैठे उन ‘सफेदपोश सहयोगियों’ पर अभी तक आंच नहीं आई है, जिन्होंने फर्जी दस्तावेज़ों को सही मानकर सरकारी खजाना लुटा दिया।
- गंभीर कानूनी धाराएं: फर्जी दस्तावेज़ तैयार करना (467, 468, 471), सरकारी धन का गबन (409, 420) और आपराधिक षड्यंत्र (120B) जैसी संगीन धाराओं के तहत यह सीधा अपराध बनता है।
- मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका: करोड़ों रुपये की फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर मोबिलाइजेशन एडवांस निकालकर उसे कहां डायवर्ट किया गया, यह मामला सीधे तौर पर प्रवर्तन निदेशालय और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच के दायरे में आता है।
ब्रांडवाणी समाचार का खुला संदेश
लोकतंत्र में जनता के विकास हेतु निर्धारित धन जब भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबों में जाने लगे, तो खामोशी भी अपराध बन जाती है। देखना यह है की अब विपक्ष मे बैठी काँग्रेस जनता तक इस घोटाले को पहुँचा पाती है या नहीं या फिर ये खबर यही दब जाएगी।
ब्रांडवाणी समाचार शासन और प्रशासन से स्पष्ट मांग करता है:
- मैसर्स तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड के साथ हुए समस्त अनुबंधों को तत्काल निरस्त कर कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया जाए और पूरी राशि की वसूली की जाए।
- सीए भावना सहित लेखा विभाग के संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ICAI को सीए का लाइसेंस रद्द करने हेतु पत्र भेजा जाए।
- प्रबंध संचालक के.वी.एस. चौधरी, एसीएस सचिन सिन्हा एवं संबंधित मंत्री इस मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए औपचारिक वक्तव्य जारी करें।
- पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हेतु सीबीआई (CBI), ईडी (ED) और ईओडब्ल्यू (EOW) को प्रकरण सौंपा जाए, ताकि कोई भी भ्रष्टाचारी कानून के दायरे से बच न सके।








