
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का एक ऐसा नया और भयावह मॉडल सामने आया है, जहां नियम और कानून सिर्फ दिखावे के लिए रह गए हैं। एक आम आदमी या छोटा कर्मचारी अगर 5000 रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे तुरंत चोर घोषित कर दिया जाता है। लेकिन जब बात 166 करोड़ रुपये की फर्जी बैंक गारंटी पचा जाने की हो तो अधिकारी और ठेकेदार की पावर को नापते हुआ समाचारों मे लिखी हुई आवाज पर भी जू नहीं रेगती है या बिना नए टेंडर के 1265 करोड़ रुपये के ठेके बांटने की, तो शासन की चुप्पी हैरान करती है। मध्य प्रदेश का लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) और जल निगम मर्यादित अब पूरी तरह से ‘घोटालों की नगरी‘ बन चुके हैं। इन महा-घोटालों के मुख्य किरदार के रूप में इंजीनियर-इन-चीफ (ईएनसी) संजय कुमार अंधवान के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं।
बिना टेंडर 1265 करोड़ के ठेके और ईएनसी अंधवान का खेल जल जीवन मिशन (जेजेएम), जो आम जनता तक पीने का साफ पानी पहुंचाने के लिए शुरू किया गया था, अब भ्रष्ट अधिकारियों की कमाई का जरिया बन गया है। 4628 प्रोजेक्ट्स के काम बिना नए टेंडर के उन्हीं पुराने ठेकेदारों को दे दिए गए जो पहले ही काम छोड़ चुके थे या बंद कर चुके थे। इन ठेकों की कुल कीमत 1265.01 करोड़ रुपये आंकी गई है।
विभाग के नियम (पीडब्ल्यूडी मैनुअल) कहते हैं कि अगर प्रोजेक्ट की लागत में 10 प्रतिशत से अधिक की मूल्य वृद्धि होती है, तो नया टेंडर किया जाना चाहिए। लेकिन यहां 20 प्रतिशत से लेकर 262.62 प्रतिशत तक की मूल्य वृद्धि होने के बावजूद बिना टेंडर के काम बांट दिए गए। उदाहरण के तौर पर, सिंगरौली जिले की 133 प्रोजेक्ट्स की लागत 70 करोड़ से बढ़कर 256 करोड़ हो गई, जिसमें 262 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और यहां 22 प्रोजेक्ट बिना टेंडर के ठेकेदारों को दिए गए। मंडला जिले की 604 योजनाओं में 118.88 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि परासिया की 314 प्रोजेक्ट्स के नए टेंडर ही नहीं किए गए।
जब इस प्रकार के भारी-भरकम भ्रष्टाचार पर वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा ईएनसी संजय कुमार अंधवान से सवाल किया गया, तो उन्होंने इसका ठीकरा शासन द्वारा बनाई गई ‘निविदा निराकरण समिति‘ पर फोड़ दिया। अंधवान का कहना है कि शासन से स्वीकृति के बाद ही काम हुआ है और वह एक प्रशासकीय कार्यालय के रूप में काम करते हैं। लेकिन पीएचई के प्रमुख सचिव सचिन सिन्हा ने स्पष्ट किया है कि डीपीआर संबंधी सारा काम ईएनसी स्तर पर ही हुआ है। सबको समझ आता है की दाल का एक दाना नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।
8032 प्रोजेक्ट्स की त्रुटिपूर्ण डीपीआर और छोटे इंजीनियरों की बलि संजय कुमार अंधवान और उनकी टीम के कुप्रबंधन का सबसे बड़ा उदाहरण 8032 नल-जल योजनाओं की गलत डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) है। इन खामियों की वजह से राज्य सरकार को 2 हजार 813 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। इन त्रुटियों को छुपाने के लिए विभाग ने 150 फील्ड इंजीनियरों की उन्नति (प्रमोशन) रोक दी और 20 इंजीनियरों की विभागीय जांच शुरू कर दी। जो मुख्य अधिकारी और कंसल्टिंग कंपनी इन गलत डीपीआर के मुख्य जिम्मेदार थे, उन्हें बचाते हुए छोटे फील्ड इंजीनियरों को बलि का बकरा बना दिया गया।
सुनील कुमार चतुर्वेदी, सरकारी इंजीनियर या बड़े बिजनेसमैन? एक तरफ सरकारी खजाने को हजारों करोड़ का चूना लग रहा है, वहीं दूसरी तरफ पीएचई के अधिकारियों की संपत्ति दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ रही है। भोपाल के प्रभारी चीफ इंजीनियर सुनील कुमार चतुर्वेदी की लाइफस्टाइल इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक प्राइवेट नौकरी करने वाले की सैलरी भले ही सरकारी नौकरी वाले से कहीं ज्यादा हो, लेकिन सुनील कुमार चतुर्वेदी जी जैसे अधिकारियों का रुतबा अलग ही है। सूत्रों की मानें तो भोपाल के मशहूर जलसा, रिट्रीट और रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट जैसे बड़े आयोजनों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में उनकी पार्टनरशिप है। यह इस बात का सबूत है कि बिना घोटालों के कोई भी सरकारी अधिकारी इतना बड़ा आदमी नहीं बन सकता। जल निगम और पीएचई में घोटाले करना इतना आसान हो गया है कि अफसर बिना किसी डर के अपना व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं।
ठेकेदार तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड और एमपी बाबरिया के साथ मिलकर 166 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी और सिस्टम की चुप्पी, इन सबके अलावा, करोड़ों रुपये की फर्जी बैंक गारंटी को पचा जाने का मामला इस पूरे विभाग की पोल खोलकर रख देता है। हैरत इस बात की है कि इतने बड़े अपराध के बाद भी किसी पर आज तक आंच नहीं आई। ऐसा प्रतीत होता है कि आपस में सेटलमेंट करने और भ्रष्टाचार को अंजाम देने में यह विभाग नटवर लाल से भी ऊपर निकाल गया है यहां कानून और नियम सिर्फ घोटालों को कवर करने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की शांति पर सवाल, सबसे बड़ा सवाल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की चुप्पी और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल की शांति पर उठता है। उनकी यह शांति इस बात को स्पष्ट करती है कि क्या अब राज्य में कानून का डंडा सिर्फ उन लोगों के लिए बचा है जो 5000 रुपये की रिश्वत में पकड़े जाते हैं? जब ईएनसी लेवल के अधिकारी और चीफ इंजीनियर मिलकर हजारों करोड़ के बिना टेंडर वाले काम बांटते हैं और जल निगम मर्यादित के प्रबंध संचालक ऐवम बड़े अधिकारी के साथ संविदा सीए भावना भारती जैसे लोग, ठेकेदार तीर्थ गोपीकॉन लिमिटेड और एमपी बाबरिया के साथ मिलकर 166 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी खुलेआम लगाए जाने के बाद भी बेफिकर होकर घूम रहे हो तो समझ लेना चाहिए की सबकी चुप्पी मे कोई तो बड़ा खेल चल रहा है।
क्या जनता और विपक्ष जागेंगे? सामने आए दस्तावेज़ इस बात की गवाही दे रहे हैं कि मध्य प्रदेश का पीएचई विभाग लूट-खसोट का मुख्यालय बन चुका है। व्यापम घोटाला भी इसके आगे बौना घोटाला है जल निगम मर्यादित के प्रबंध संचालक, बड़े अधिकारी, संविदा सीए भावना भारती, जल जीवन मिशन के इंजीनियर-इन-चीफ (ईएनसी) संजय कुमार अंधवान और सुनील कुमार चतुर्वेदी जैसे अधिकारियों के कानून को दरकिनार करने के बाद अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या राज्य की जनता और विपक्ष इस भ्रष्टाचार पर सवाल उठाते हैं या नहीं।
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