MP Secretariat Exposed: वल्लभ भवन की ऊँची मंज़िलों पर कैसे कुचली जाती है छोटे व्यापारी की आवाज़ ?

बल्लभ भवन की ‘पाँचवीं मंज़िल’ का तिलस्म: जहाँ छोटे व्यापारियों की आवाज़ दम तोड़ देती है!

भोपाल | मध्य प्रदेश की सत्ता का केंद्र ‘वल्लभ भवन’ आज छोटे व्यापारियों के लिए किसी अभेद्य किले से कम नहीं रह गया है। प्रदेश के आर्थिक ढांचे की रीढ़ कहे जाने वाले छोटे और मध्यम व्यापारी आज शासन-प्रशासन की बेरुखी का शिकार हैं। आरोप गंभीर हैं कि मंत्रालय की ऊँची मंजिलों पर बैठे बड़े अधिकारी और रसूखदार नेता सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट घरानों और ‘खास’ चेहरों के लिए रेड कार्पेट बिछाते हैं, जबकि एक सीधा-साधा छोटा व्यापारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते हार जाता है।

साठ-गांठ का साम्राज्य: क्या आम व्यापारी की कोई अहमियत नहीं?

मंत्रालय के गलियारों में यह चर्चा आम है कि अधिकारियों के पास बड़े व्यापारियों के साथ घंटों लंबी बैठकें करने और ‘डील’ फाइनल करने का समय तो है, लेकिन जब कोई छोटा व्यापारी अपनी जायज समस्या लेकर पहुँचता है, तो उसे गेट पर ही रोक दिया जाता है। अगर कोई हिम्मत करके अंदर पहुँच भी जाए, तो अधिकारी उसकी बातों को अनसुना कर देते हैं या उसे तुच्छ समझकर अपमानित करते हैं।

“अधिकारी मंत्रालय को अपना निजी साम्राज्य समझने लगे हैं। उन्हें लगता है कि विकास सिर्फ बड़े निवेश से आता है, जबकि वे भूल रहे हैं कि मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था को जमीन पर छोटे व्यापारी ही जिंदा रखते हैं।”

पाँचवीं मंज़िल का ‘सिस्टम’ और छोटे व्यापारियों का दर्द

विशेष रूप से पाँचवीं मंजिल पर बैठने वाले आला अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। छोटे व्यापारियों का कहना है कि:

  • मिलने से इनकार: छोटे व्यापारियों को महीनों तक अपॉइंटमेंट नहीं मिलता।
  • अनसुनी फरियाद: अगर मुलाकात हो भी जाए, तो फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
  • बड़े घरानों को प्राथमिकता: नीतियों का निर्धारण और लाभ का वितरण अक्सर उन्हीं के पक्ष में होता है जिनसे अधिकारियों की ‘साठ-गांठ’ होती है।

क्या झुककर ही रहेगा व्यापारी?

सवाल यह उठता है कि क्या मध्य प्रदेश में शासन इसी तरह चलेगा? क्या ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा सिर्फ चुनावी रैलियों तक सीमित है? छोटे व्यापारियों में बढ़ता यह आक्रोश आने वाले समय में सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि शासन ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली, तो वह दिन दूर नहीं जब प्रदेश का यह मेहनतकश वर्ग सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा।

क्या मुख्यमंत्री इस ‘नौकरशाही के साम्राज्य’ पर लगाम लगाएंगे या छोटा व्यापारी इसी तरह रसूखदारों के आगे झुकने को मजबूर रहेगा?

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