
मध्य प्रदेश के सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों मंत्रालय की ‘पांचवीं मंजिल’ सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। माना जाता है कि यहीं से सरकार के कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसलों की रूपरेखा तैयार होती है। लेकिन हाल के दिनों में लगातार अधिकारियों के विभाग बदलने, तबादलों और नई जिम्मेदारियों की चर्चाओं ने इस मंजिल को सुर्खियों में ला दिया है। प्रशासनिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां बन रही हैं, जिनकी वजह से अधिकारी लंबे समय तक एक ही स्थान पर टिक नहीं पा रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय में कई वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से हटाकर नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, जबकि कुछ अधिकारियों ने स्वयं भी दूसरे विभागों में जाने की इच्छा जताई है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा भी है कि बार-बार होने वाले इन बदलावों का असर केवल प्रशासनिक निर्णयों की गति पर ही नहीं, बल्कि विभागों के बीच समन्वय और कार्यप्रणाली पर भी पड़ रहा है। हालांकि सरकार की ओर से इन तबादलों को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया जाता रहा है।
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि किसी भी सरकार में समय-समय पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदलना सामान्य प्रक्रिया होती है, लेकिन जब यह सिलसिला लगातार चर्चा का विषय बनने लगे तो इसके पीछे के कारणों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। विभागीय स्तर पर अनुभव, समन्वय और निर्णय लेने की निरंतरता प्रशासन की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में बार-बार होने वाले फेरबदल से कामकाज की गति और नीतियों के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ सकता है।
फिलहाल मंत्रालय की पांचवीं मंजिल को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं जारी हैं। कुछ लोग इसे बदलती प्रशासनिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे सत्ता और नौकरशाही के बीच नए समीकरणों का संकेत मान रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में सरकार के अगले प्रशासनिक फैसले इस बात को और स्पष्ट करेंगे कि यह बदलाव केवल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं या फिर प्रशासनिक ढांचे में किसी बड़े परिवर्तन की भूमिका तैयार हो रही है।
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