
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक विभाग की हालत कुछ ऐसी है कि पावर सेंटर बढ़ते जा रहे हैं और विभाग सिमटता जा रहा है। चर्चा है कि प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी से जुड़े इस विभाग में मंत्रीजी के अलावा कई दूसरे पावर सेंटर भी तैयार हो गए हैं। नतीजा यह कि विभाग का मूल काम पीछे छूटता जा रहा है और अंदरखाने खींचतान का खेल आगे निकल गया है। कहा जा रहा है कि एक तरफ मंत्रीजी का अपना प्रभाव है, तो दूसरी तरफ उनके करीबियों के साथ-साथ परिजनों की भी विभाग में सक्रियता बढ़ गई है। अफसरों की मानें तो फैसलों और कामकाज में कई स्तरों से दखल की चर्चाएं अब इतनी आम हो गई हैं कि विभाग के अधिकारी भी असमंजस में हैं कि आखिर आदेश किसका माना जाए।
मजेदार बात यह है कि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मंत्रीजी को कई बार संकेत दे चुके हैं- साहब, जरा देखिए यहां क्या चल रहा है। लेकिन मंत्रीजी तक शिकायतें पहुंचने के बाद भी तस्वीर बदलती नजर नहीं आ रही। गलियारों में तो यहां तक चुटकी ली जा रही है कि विभाग में फाइलें भले एक रास्ते से चलें, लेकिन सिफारिशों के रास्ते कई हैं। अफसर परेशान हैं कि काम करें तो किसकी सुनें और शिकायत करें तो किससे? विभाग के भीतर अलग-अलग स्तरों से दखल की चर्चाओं के कारण अधिकारियों के सामने असमंजस की स्थिति बनी हुई बताई जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि विभाग में बढ़ते पावर सेंटरों के कारण आखिर विभाग का मूल काम किस तरह प्रभावित हो रहा है। एक तरफ मंत्रीजी का प्रभाव और दूसरी तरफ उनके करीबियों तथा परिजनों की सक्रियता की चर्चा के बीच अफसरों के सामने आदेश और कामकाज को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बातें सामने आ रही हैं। वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से भी मंत्रीजी को स्थिति से अवगत कराने की बात कही जा रही है, लेकिन शिकायतों के बाद भी तस्वीर बदलती नजर नहीं आ रही। अब सवाल यही है- मंत्रीजी विभाग संभाल रहे हैं या विभाग में बने पावर सेंटर मंत्रीजी को संभाल रहे हैं?
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