नीति निर्माण संस्था में भीतरी टकराव का नाटकीय अंत: उपाध्यक्ष की जीत, CEO हटाए गए

भोपाल: सत्ता की राजधानी से इस समय की बेहद अहम और चौंकाने वाली सूचना सामने आई है। जहां एक प्रभावशाली नीति निर्माण संस्था में काफी समय से जारी ‘भीतरी टकराव’ का आखिरकार एक नाटकीय निष्कर्ष सामने आ गया। एक ओर संस्था के हाल ही में नियुक्त उपाध्यक्ष (VC) थे और दूसरी ओर सख्त स्वभाव वाले प्रमुख सचिव स्तर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO)। लेकिन इस टकराव में आखिर किसने जीत हासिल की और कौन परास्त हुआ, इसकी दास्तान किसी सिनेमाई कहानी से कम नहीं बताई जा रही।

पूरे विवाद की शुरुआत उपाध्यक्ष और CEO के बीच शुरुआती दौर से ही तालमेल के अभाव से हुई। एक तरफ उपाध्यक्ष अपने नए दृष्टिकोण के साथ संस्थान को आगे बढ़ाना चाहते थे, जबकि दूसरी तरफ प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी अपनी कठोर कार्यशैली के लिए पहचाने जाते थे। दोनों के बीच चल रही यह ‘अनबन’ अब तक बंद दफ्तरों तक सीमित थी, लेकिन वास्तविक हलचल उस समय मची जब संस्थान से जुड़ी एक ‘अत्यंत संवेदनशील रिपोर्ट’ बाहर पहुंच गई।

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जैसे ही यह गोपनीय दस्तावेज एक सामाजिक कार्यकर्ता तक पहुंचा, उपाध्यक्ष ने बिना देरी किए इसकी सूचना सीधे ‘उच्च स्तर’ तक पहुंचा दी। यहीं से पूरा समीकरण बदल गया। जिस पद पर प्रमुख सचिव की पकड़ मजबूत मानी जा रही थी, वह अचानक कमजोर पड़ने लगी। रिपोर्ट के लीक होने को सरकार ने गंभीर मामला मानते हुए अंततः CEO को पद से हटाने का आदेश जारी कर दिया।

पूरे घटनाक्रम का सबसे अप्रत्याशित पहलू यह रहा कि इससे वर्षों से चली आ रही परंपरा भी टूट गई। जिस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर अब तक केवल IAS अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, वहां सरकार ने एक IFS (भारतीय वन सेवा) अधिकारी को नियुक्त कर सबको चौंका दिया।

सत्ता के दफ्तरों में इस बदलाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इसे केवल प्रशासनिक बदलाव माना जाए या फिर भविष्य के लिए कोई सख्त संकेत—इस पर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि सरकार ने इस फैसले से यह संदेश दिया है कि अनुशासन और गोपनीयता के नियमों से समझौता किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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    Rashel Kachwah Rajput

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