
एक आदिवासी जिले के कलेक्टर साहब के बंगले पर पिछले दिनों गणेश प्रतिमा की स्थापना हुई। चतुर्थी से लेकर गणेश विसर्जन तक दोनों समय पूजा-अर्चना और आरती की जिम्मेदारी एक स्थानीय पंडिताई करने वाले “पुरोहित” जी को सौंपी गई। पूजा-पाठ के बहाने कलेक्टर साहब के बंगले पर लगातार आवाजाही ने ‘पुरोहित’ जी की नजदीकियां कुछ ऐसी बढ़ाई कि अब उनकी पहचान महज पूजा कराने वाले पंडित की नहीं रह गई है। कहा जा रहा है कि क्षेत्र की जनता को कोई काम हो तो ‘पुरोहित’ जी के दरबार में पहुंचना शुरू हो गया है।
साहब से नजदीकी का हवाला देकर काम कराने की उम्मीद भी जताई जाती है और कई मामलों में ‘पुरोहित’ जी खुद ही पैरवी करते नजर आते हैं। पूजा-पाठ के बहाने कलेक्टर साहब के बंगले पर उनकी लगातार आवाजाही और वहां बढ़ी नजदीकी को लेकर क्षेत्र में चर्चाएं हैं। लोगों के बीच यह बात कही जा रही है कि अब किसी काम के सिलसिले में ‘पुरोहित’ जी के जरिए कलेक्टर साहब तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है और इसी नजदीकी को उनकी पैरवी की ताकत के तौर पर देखा जा रहा है।
जाहिर है, पंडित हैं तो दक्षिणा भी लेते हैं। लेकिन खबर में यह भी कहा गया है कि दक्षिणा का एक बड़ा हिस्सा कलेक्टर साहब को देना होता है। इस पूरे मामले को लेकर खबर में कलेक्टर बंगले पर पूजा-पाठ के बहाने बढ़ी आवाजाही, ‘पुरोहित’ जी की बढ़ती नजदीकी और लोगों के काम कराने के लिए उनकी कथित पैरवी को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
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