The LIC Trap, 10 साल, 15 लाख करोड़ और एक ‘खतरनाक’ पैटर्न

सोशल मीडिया पर Rajesh Exports से जुड़े एक वीडियो में “सरकार ने कैसे किया महा-स्कैम?” जैसे सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, पूरे मामले को तथ्यात्मक रूप से देखें तो अभी यह कहना सही नहीं होगा कि “सरकार ने ₹15 लाख करोड़ का स्कैम किया।” मामला दरअसल Rajesh Exports के वित्तीय आंकड़ों में कथित गड़बड़ी और उस पर बाजार नियामक SEBI की कार्रवाई से जुड़ा है। SEBI के अंतरिम आदेश में FY2020-21 से FY2024-25 के बीच करीब ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व को प्रथम दृष्टया गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया किए जाने का आरोप लगाया गया है। 

₹15.15 लाख करोड़ के आंकड़े पर SEBI ने क्या कहा?

SEBI के अनुसार Rajesh Exports ने पांच वित्तीय वर्षों में करीब ₹15.45 लाख करोड़ का समेकित राजस्व रिपोर्ट किया। इसमें लगभग ₹15.18 लाख करोड़ की राशि विदेशी सहायक कंपनियां और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियां जुड़ी हुई थीं। इन दावों में से करीब ₹15.15 लाख करोड़ को प्रथम दृष्टया गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है माना है, जोसहायक कंपनियों से जुड़ा राजस्व का लगभग 99.80 प्रतिशत है। 

SEBI की चिंता का बड़ा कारण विदेशी कंपनियों से जुड़े आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाना है। नियामक के मुताबिक कंपनी सेग्राहक-वार बिक्री, विक्रेता-वार खरीदारी, लेनदारों-देनदारों की जानकारी और सहायक कंपनियों के वित्तीय विवरण समेत कई दस्तावेज मांगे गए थे। जांच के दौरान इन सूचनाओं को लेकर गंभीर सवाल सामने आए। 

Valcambi के आंकड़ों से क्यों बढ़ा विवाद?

Rajesh Exports की विदेशी संरचना मेंस्विट्ज़रलैंड में वालकैम्बी एसए की प्रमुख परिचालन इकाई स्थित है के तौर पर बताया गया था। SEBI ने कंपनी के समेकित राजस्व की तुलना Valcambi के ऑडिट किया गया स्टैंडअलोन रेवेन्यू से की तो बड़ा अंतर सामने आया।

नियामक के अनुसार FY2020-21 से FY2024-25 तक Valcambi की ऑडिट किया गया राजस्व करीब ₹3,027 करोड़ रही, जबकि इसी अवधि मेंविंडोज़ से सहायक कंपनियों ने राजस्व की सूचना दी कई लाख करोड़ रुपये में था। SEBI ने इसी अंतर और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर रेवेन्यू रिपोर्टिंगg पर सवाल उठाए। 

कंपनी की ओर से यह तर्क दिया गया कि Valcambi के स्टैंडअलोन खाते में मुख्य रूप से प्रसंस्करण शुल्क और मूल्यवर्धन आय दिखाई जाती है, जबकि समूह स्तर परसोने के लेन-देन की ग्रॉस वैल्यू को रेवेन्यू के रूप में दर्ज किया गया। लेकिन SEBI ने कहा कि इस अकाउंटिंग ट्रीटमेंट को साबित करने के लिए पर्याप्त सहायक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं कराया गया। 

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LIC और सरकारी बैंकों का क्या कनेक्शन है?

यही हिस्सा सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में है। LIC की Rajesh Exports में करीब 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। SEBI की कार्रवाई के बाद LIC की इस हिस्सेदारी को लेकर राजनीतिक सवाल भी उठे हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल किया कि इतनी बड़ी संस्थागत होल्डिंग के बावजूद कथित गड़बड़ियों का पता पहले क्यों नहीं चला। 

इसके अलावा Canara Bank का भी कंपनी से जुड़ा वित्तीय खुलासा सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार बैंक ने कंपनी की करीब ₹509 करोड़ की देनदारी को लेकर दिवालियापन की कार्यवाही से जुड़ा कदम उठाया और तनावपूर्ण संपर्कको बेचने की प्रक्रिया शुरू की।  लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि LIC या Canara Bank को SEBI ने इस कथित राजस्व को गलत तरीके से दिखाना में आरोपी बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों में इन संस्थानों की भूमिका मुख्य रूप से निवेशक/ऋणदाता के तौर पर सामने आती है।

₹11,487 करोड़ के लेनदेन पर भी सवाल

SEBI ने Rajesh Exports और एफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच करीब ₹11,487 करोड़ की बिक्री और ₹11,488 करोड़ की खरीद पर भी सवाल उठाए हैं। नियामक के अनुसार इन लेनदेन की प्रकृति और वास्तविकता की जांच जरूरी है। समृद्धि ने कथित तौर पर इन लेनदेन से इनकार किया। 

SEBI ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनी से करीब ₹339 करोड़ की राशि प्रमोटर राजेश मेहता से जुड़े व्यक्तिगत खाते तक पहुंची, जिसमें व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से जुड़े लेनदेन शामिल थे। नियामक ने कुल मिलाकर शेयरधारक की संपत्ति में कमी का अनुमान ₹12,726 करोड़ तक लगाया है। 

सरकार ने क्या किया और मामला अभी कहां है?

SEBI ने जून 2026 में Rajesh Exports और उसके CMD Rajesh Mehta के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया और Rajesh Mehta को प्रतिभूति बाज़ार में कारोबार करने से रोक दिया। साथ ही कंपनी की वित्तीय खुलासे और संबंधित पक्षों के बीच लेन-देन को लेकर भी निर्देश दिए गए। 

कंपनी ने SEBI के आरोपों से असहमति जताई है और कहा है कि उसके द्वारा रिपोर्ट किया गया आय सही है। कंपनी ने मामले को संवादहीनता और भ्रम से जुड़ा बताया है। यानी अभी अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। 

Rajesh Exports का मामला ₹15.15 लाख करोड़ के कथित राजस्व को गलत तरीके से दिखाना, विदेशी सहायक के आंकड़ों, ₹11,000 करोड़ से अधिक के संदिग्ध लेनदेन और निवेशकों की संपत्ति में कमी जैसे गंभीर सवालों से जुड़ा है। “सरकार ने ₹15 लाख करोड़ का घोटाला किया” कहना फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड में SEBI ने कंपनी और उसके प्रमोटर के खिलाफ प्रथम दृष्टया निष्कर्ष दर्ज की हैं, जबकि LIC और Canara Bank जैसे सरकारी संस्थानों की भूमिका निवेशक/ऋणदाता की है। मामले में आगे की नियामक और अन्य जांच से तस्वीर और स्पष्ट होगी। 

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Srota Swati Tripathy

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