
एक बड़े जिले के एसपी साहब इन दिनों अपनी ही पोस्टिंग को लेकर असमंजस में पड़ गए हैं। साहब की लंबे समय से इच्छा थी कि उन्हें नक्सलमुक्त हुए जिले की कमान मिल जाए। इसके लिए उन्होंने बाकायदा पुलिस मुख्यालय में अपनी तरफ से पूरी बिसात बिछाई थी। पिछले दिनों पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी दावेदारी भी पेश कर दी। वहां से मिले सकारात्मक संकेतों के बाद तो साहब ने मान लिया था कि अगली पारी अब नए जिले से ही शुरू होगी। साहब का भरोसा इतना बढ़ गया कि उन्होंने मौजूदा जिले में कामकाज से भी लगभग हाथ खींच लिया। बोरिया-बिस्तर बांधने की तैयारी शुरू हो गई और जिले के जनप्रतिनिधियों के फोन तक उठने बंद हो गए। जिन्हें साहब पहले तत्काल फोन वापस करते थे, उनके कॉल अब इंतजार ही करते रह गए।
इधर, पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी नक्सलमुक्त जिले के कप्तान के लिए उनका नाम प्रस्तावित कर दिया। साहब को लगने लगा कि अब तो बस आदेश निकलने की औपचारिकता बाकी है। लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट सरकार के स्तर पर आया। सरकार ने साहब के नाम पर सहमति देने से ही इनकार कर दिया। अब साहब की सारी तैयारियां धरी रह गईं। न नए जिले की कमान मिली और न ही पुरानी जगह से जाने का रास्ता साफ हुआ। पुलिस मुख्यालय से मिले सकारात्मक संकेतों के बाद साहब ने जिस तरह से अपनी अगली पोस्टिंग को लेकर उम्मीदें लगा ली थीं, सरकार के फैसले ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
उधर, जिस जिले की कप्तानी के लिए साहब इतने दिनों से जोड़-तोड़ कर रहे थे, वहां अब नए कप्तान की तलाश शुरू हो गई है। साहब के लिए यह स्थिति किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि वह पहले ही नए जिले में अपनी अगली पारी शुरू होने की उम्मीद कर चुके थे। अब पुरानी जगह से जाने का रास्ता भी साफ नहीं हुआ और नई जगह की कमान भी नहीं मिली। फिलहाल यह जिला नक्सलमुक्त होने के साथ ही पुलिस कप्तान मुक्त हो गया है।
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