क्या सवर्णों का वजूद मिटाने पर तुली है सरकार? UGC के नए चक्रव्यूह में फंसा ब्राह्मण और सवर्ण समाज — एक कड़वा विश्लेषण

नमस्कार, आज हम बात करेंगे उस वर्ग की जिसने सदियों से राष्ट्र को बौद्धिक नेतृत्व दिया, लेकिन आज वही वर्ग अपनी ही व्यवस्था में हाशिए पर धकेला जा रहा है। हम बात कर रहे हैं UGC के उन विवादित नियमों की, जो कहने को तो ‘समानता‘ की बात करते हैं, लेकिन सवर्णों के लिए ‘अयोग्यता‘ का ठप्पा बनते जा रहे हैं। आखिर क्यों बीजेपी सरकार, जिसे सवर्णों का सबसे बड़ा हिमायती माना जाता था, आज उसी वर्ग के अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है?”

1. क्या है यूजीसी नियम और आरक्षण का गणित? यूजीसी के नियमों के तहत विश्वविद्यालयों में ‘विभाग‘ को इकाई मानकर रोस्टर लागू किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गणितीय उलझन की वजह से सामान्य वर्ग (General Category) की सीटें सिमटती जा रही हैं। यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (अवसर की समानता) के बीच एक बारीक रेखा खींचता है, लेकिन सवर्णों का आरोप है कि यह उनके संवैधानिक हितों का हनन है।

 सवर्ण वर्गों को नुकसान: प्रतिभा का पलायन या दमन? जब पदों का विज्ञापन निकलता है, तो रोस्टर प्रणाली के तहत सवर्णों के लिए मौके शून्य के बराबर रह जाते हैं। विशेषकर ब्राह्मण वर्ग, जिसका मुख्य आधार शिक्षा और अध्यापन रहा है, आज अपने ही संस्थानों में ‘अवांछित‘ महसूस कर रहा है। उच्च शिक्षा में योग्यता (Merit) को दरकिनार कर केवल जातिगत समीकरणों को साधना क्या देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?

सरकार की चुप्पी: क्या सवर्ण अब ‘सॉफ्ट टारगेट‘ हैं? इतने भारी विरोध और सवर्णों की नाराजगी के बावजूद सरकार टस से मस होने को तैयार नहीं है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि क्या बीजेपी अब ‘बहुजन राजनीति‘ की राह पर चलते हुए अपने कोर वोटर यानी सवर्णों को बलि का बकरा बना रही है? क्या ब्राह्मणों की बौद्धिक विरासत को नष्ट करने की कोई गुप्त योजना काम कर रही है?

 तीखा सवाल: क्या बीजेपी सवर्ण विरोधी हो गई है? यह सवाल आज हर सवर्ण युवा के मन में है। ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का नारा देने वाली सरकार क्या अब केवल ‘वोट बैंक‘ की राजनीति के लिए एक विशिष्ट वर्ग को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर करने पर तुली है? सवर्णों का शिकार आखिर कब तक जारी रहेगा?

यह सच है कि रोस्टर प्रणाली और आरक्षण नीतियों से सामान्य वर्ग के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और अवसर कम हुए हैं। हालांकि, सरकार का तर्क है कि वह संविधान के सामाजिक न्याय (Social Justice) के ढांचे को मजबूत कर रही है। लेकिन जब एक बड़ा वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो लोकतंत्र में संवाद की कमी साफ झलकती है।

  • gaurav singh rajput

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