
कमीशन का ‘मैनेजमेंट’ देखिये: जो जितना ज्यादा ‘कट’ खिलाएगा, वर्क ऑर्डर उसी की झोली में जाएगा; दागी अफसरों की फौज ने विभाग को बनाया भ्रष्टाचार का हेडक्वार्टर
विशेष रिपोर्ट | भोपाल
मध्य प्रदेश का जनसंपर्क विभाग और ‘माध्यम’ (Madhyam) इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के ‘इवेंट मैनेजमेंट’ को लेकर सुर्खियों में है। गलियारों में चर्चा आम है कि यहाँ काम योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं, बल्कि ‘कमीशन’ के प्रतिशत पर तय होता है। टेंट लगाने से लेकर बड़े आयोजनों के नाम पर सरकारी खजाने में ऐसी सेंध लगाई जा रही है कि आम जनता का खून-पसीना पानी की तरह बहाया जा रहा है।
कमीशन दो, काम लो: यही है ‘माध्यम‘ का नया मूलमंत्र
सूत्रों की मानें तो विभाग में एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है जो केवल उन्हीं वेंडर्स और चहेतों को काम बांटता है जो भारी-भरकम कमीशन देने में माहिर हैं। आरोप हैं कि:
- टेंट के नाम पर लूट: छोटे कार्यक्रमों में भी लाखों-करोड़ों के टेंट और दिखावे के बिल लगाए जा रहे हैं।
- मैनेजमेंट के माहिर अफसर: यहाँ उन्हीं अधिकारियों को टिकाया जाता है जो ‘मैनेजमेंट’ (लेन-देन) के उस्ताद हैं। जनता इन्हें ‘कमीशन एजेंट’ की तरह देखने लगी है।
- फिक्सिंग का खेल: टेंडर प्रक्रिया महज एक दिखावा बनकर रह गई है। बैकडेट में कागजी खानापूर्ति कर पहले ही तय कर लिया जाता है कि ‘मलाई’ किसे मिलेगी।
क्या मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की आंखों पर बंधी है पट्टी?
जनता पूछ रही है कि जब विभाग में खुलेआम करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, तो शासन-प्रशासन मौन क्यों है? क्या यह कमीशन का खेल ऊपर तक जा रहा है या फिर अधिकारी इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उन्हें सरकार का डर ही नहीं रहा?
कब थमेगा यह खेल?
जनसंपर्क विभाग का काम सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाना था, लेकिन अब विभाग खुद भ्रष्टाचार की ‘उपलब्धियां’ रच रहा है। अगर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव ने जल्द ही इन ‘मैनेजमेंट गुरु’ अफसरों पर नकेल नहीं कसी, तो यह दाग वर्तमान सरकार की छवि को पूरी तरह धूमिल कर देगा।
क्या अब भी ‘सब चंगा सी’ का राग अलापा जाएगा या इन लुटेरों पर ‘बुलडोजर’ चलेगा?









