
प्रदेश के एक बड़े सरकारी अस्पताल में पदस्थ एक सिविल सर्जन इन दिनों स्वास्थ्य विभाग में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। विभागीय गलियारों में उनके प्रभाव और प्रशासनिक पकड़ को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। बताया जा रहा है कि अस्पताल के भीतर कई बार शिकायतें और विवाद सामने आने के बावजूद संबंधित अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। यही वजह है कि अब स्वास्थ्य विभाग के भीतर उनके रसूख को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं।
सूत्रों के अनुसार हाल ही में अस्पताल के कामकाज और व्यवस्थाओं को लेकर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने नाराजगी जताई थी। जानकारी यह भी सामने आई कि अस्पताल निरीक्षण के दौरान कई व्यवस्थागत कमियां और प्रशासनिक लापरवाहियां सामने आई थीं। इसके बावजूद संबंधित सिविल सर्जन के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया गया। विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि अधिकारी की पहुंच और प्रभाव के चलते कार्रवाई की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय में अस्पताल से जुड़े कई मामलों को लेकर नोटिस और चेतावनी जैसे कदम उठाने की बातें जरूर हुईं, लेकिन वे फाइलों और बैठकों तक ही सीमित रह गईं। स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारियों का मानना है कि अगर अस्पताल प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी है, तो सभी अधिकारियों के लिए समान नियम लागू होने चाहिए। वहीं कुछ लोग इसे विभागीय राजनीति और अंदरूनी समीकरणों से भी जोड़कर देख रहे हैं।
फिलहाल अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग दोनों ही इस पूरे मामले पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा कुछ बोलने से बच रहे हैं। लेकिन प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर कब तक प्रभावशाली अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई केवल चर्चाओं और फाइलों तक सीमित रहेगी। आने वाले दिनों में विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
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