
गुवाहाटी: असम विधानसभा ने बुधवार को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ‘समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026’ को पारित कर दिया है। 126 सदस्यीय असम विधानसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के 102 विधायकों ने इस विधेयक के पक्ष में मतदान किया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य धर्म से ऊपर उठकर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन (सह-जीवनसाथी) संबंधों को नियंत्रित करने के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। हालांकि, चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने इस बिल को प्रवर समिति के पास भेजने की पुरजोर मांग की थी।
देश का तीसरा UCC राज्य बना असम
इस अहम विधेयक के पारित होने के साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पास करने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है।
सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का कांग्रेस पर तीखा हमला
विधेयक पर चर्चा के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने सबसे पहले साल 1925 में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की वकालत की थी।” मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि विपक्षी पार्टी अब धर्मनिरपेक्ष नहीं रह गई है, बल्कि एक खास समुदाय की प्रतिनिधि बनकर रह गई है।
‘समान नागरिक संहिता, असम, 2026 बिल’ पर उठे सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तावित कानून किसी भाजपा या आरएसएस की विचारधारा पर नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (Article 44) की मजबूत बुनियाद पर आधारित है, जैसा कि विपक्ष द्वारा आरोप लगाया जा रहा है।
नेहरू और गोवा का दिया हवाला
इतिहास का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “यूसीसी का इतिहास बेहद पुराना है। इसकी मांग सर्वप्रथम 1925 में कांग्रेस ने उठाई थी और 1937 में जवाहरलाल नेहरू ने भी इसका सुझाव दिया था। आज वही कांग्रेस इसका विरोध हिंदू, ईसाई या आदिवासी नजरिए से नहीं, बल्कि कुरान और शरीयत के एंगल से कर रही है।”
उन्होंने कांग्रेस की बनावट पर सवाल उठाते हुए आगे कहा, “कांग्रेस यूसीसी का विरोध कर रही है। उनकी विधानसभा की बनावट यह साफ करती है कि वे सभी जातियों, पंथों और धर्मों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे, बल्कि सिर्फ एक विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। कांग्रेस असम के संपूर्ण भूगोल का प्रतिनिधित्व नहीं करती।” गौर करने वाली बात है कि 126 सदस्यीय असम विधानसभा में कांग्रेस के कुल 19 विधायक हैं, जिनमें से 18 मुस्लिम समुदाय से हैं और केवल एक हिंदू विधायक है।
मुख्यमंत्री ने कहा, “कांग्रेस को इस स्थिति में देखकर बहुत दुख और तकलीफ होती है। हमारे बयानों में सभी धर्मों और सभी लोगों का प्रतिनिधित्व झलकना चाहिए। मेरा मानना है कि कांग्रेस को सांप्रदायिक पार्टी बनने के बजाय भारत की गौरवशाली सेक्युलर परंपरा का पालन करना चाहिए।”
गोवा राज्य की मिसाल देते हुए उन्होंने कहा कि जब 1961 में यह तटीय राज्य भारत संघ में शामिल हुआ, तो उस समय की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वहां पुर्तगाली कॉमन सिविल कोड को जारी रहने दिया था। गोवा ने विलय के बाद अपने मौजूदा पारिवारिक कानून – ‘1867 के पुर्तगाली सिविल कोड’ को बनाए रखा और बाद में इसका नाम बदलकर ‘गोवा सिविल कोड’ कर दिया गया था।
आदिवासियों को दायरे से बाहर रखने पर दी सफाई
सीएम सरमा ने जोर देकर कहा “उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम भारत का तीसरा ऐसा राज्य होगा जहां यूसीसी लागू होगा, जो लैंगिक न्याय की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम साबित होगा। संविधान का आर्टिकल 44 ही इस पूरे बिल की नींव है।” विधेयक के दायरे से आदिवासी समुदायों को बाहर रखने के फैसले को सही ठहराते हुए उन्होंने दावा किया कि इन निजी मामलों पर आदिवासियों के पास सदियों से अपने कई पारंपरिक कानून मौजूद हैं।
उन्होंने कहा, “आदिवासी समाज एक से ज़्यादा शादी (बहुविवाह) का समर्थन नहीं करता, वे अपनी लड़कियों को बराबर का अधिकार देते हैं और लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता नहीं देते। वे एक तरह से सदियों से खुद ही यूसीसी का पालन कर रहे हैं। चूंकि आत्म-नियमन ही सबसे अच्छा विनियमन है, इसलिए हम इस कानून को आदिवासियों पर थोपना नहीं चाहते।”
सोमवार को विधानसभा में पेश हुआ था बिल
विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे कई निजी मामलों पर सभी धर्मों के लिए एक समान कानून बनाने के उद्देश्य से असम सरकार ने सोमवार को इस विधेयक को विधानसभा पटल पर पेश किया था। इस कानून में मुख्य रूप से बहुविवाह (एक से ज्यादा शादी) पर पूरी तरह रोक लगाने और लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) कराने का प्रावधान किया गया है।
बिल के मसौदे में यह स्पष्ट किया गया है कि यह कानून असम में निवास करने वाली किसी भी अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होगा। इस कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं, जिसके तहत दो या दो से अधिक शादियां करने पर दोषी को सात साल की जेल और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन न कराने पर तीन महीने की जेल की सजा का प्रस्ताव रखा गया है।
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