
राजनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। कांग्रेस की कद्दावर नेता मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन रद्द होने के बाद देश की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस इसे चुनाव आयोग की सोची-समझी साजिश बता रही है, तो वहीं विरोधी दल इसे तकनीकी खामी और कांग्रेस की लापरवाही करार दे रहे हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात जो निकलकर सामने आई है, वो है कांग्रेस की एकजुटता। नामांकन रद्द होने के बाद जिस तरह से पूरी कांग्रेस एकजुट होकर सरकार को घेरने में जुट गई है, उसने यह साफ कर दिया है कि विपक्ष अब बैकफुट पर रहने के मूड में नहीं है। आइए देखते हैं इस पर हमारी विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।
मीनाक्षी नटराजन—कांग्रेस का एक ऐसा चेहरा जो अपनी सादगी और जमीनी पकड़ के लिए जाना जाता है। राज्यसभा चुनाव के लिए उनके नामांकन का रद्द होना महज एक तकनीकी फैसला है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश है? यह सवाल इस वक्त देश के राजनीतिक मंच पर तैर रहा है।
जहां एक तरफ कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ जानकारों का मानना है कि नामांकन पत्र में हुई कोई छोटी सी चूक भी इस तरह के नतीजों के लिए जिम्मेदार हो सकती है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इस फैसले ने कांग्रेस को एक मंच पर आने का बड़ा मौका दे दिया है।
इस घटना के बाद से कांग्रेस के सुर काफी तीखे हो गए हैं। बिखरी हुई नजर आने वाली पार्टी अब एक सुर में सरकार पर हमलावर है। संसद से लेकर सड़क तक, सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मीनाक्षी नटराजन के बहाने ही सही, लेकिन कांग्रेस ने अपनी आंतरिक गुटबाजी को भुलाकर यह दिखा दिया है कि संकट के समय वह पूरी तरह एकजुट है।
लेकिन राजनीति के इस खेल के बीच सबसे बड़ा सवाल आज देश की जनता का है।
* क्या नेताओं की यह एकजुटता सिर्फ अपनी पार्टी के सहयोगियों के टिकट कटने तक सीमित रहेगी?
* क्या विपक्ष इसी आक्रामकता के साथ जनता के असली मुद्दों को उठाएगा?
आज देश की आम जनता महंगाई के बोझ तले दबी हुई है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस से लेकर खाने-पीने की जरूरी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। मध्यम वर्ग और गरीब परिवार का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ जनता के भीतर एक खामोश गुस्सा है।
अब देखना यह होगा कि क्या कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस एकजुटता को ‘जन-आंदोलन’ में बदल पाते हैं या नहीं? क्या नेता एसी कमरों से बाहर निकलकर, जनता के बीच जाकर महंगाई और बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे? क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है, और जब तक विपक्ष जनता के मुद्दों को लेकर सड़कों पर नहीं उतरेगा, तब तक चुनावी बिसात पर शह और मात का यह खेल यूं ही चलता रहेगा।
आपको क्या लगता है, क्या विपक्ष का यह आक्रामक रूप केवल इस चुनावी विवाद तक सीमित रहेगा, या फिर आने वाले दिनों में हमें महंगाई के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन देखने को मिलेगा?
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