क्या ED/CBI के ‘डर’ से बिक रही हैं कंपनियां? अडाणी साम्राज्य और छापों का वो ‘इत्तेफाक’ जिसने खड़े किए गंभीर सवाल?

“पहले रेड, फिर जेल और फिर सीधे अडाणी से डील?” – जानिए उन बड़ी कंपनियों की कहानी, जिनके प्रमोटर्स पर केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा कसा और बाद में उनके एसेट्स का रास्ता एक ही कॉर्पोरेट घराने की तरफ मुड़ गया।
क्या देश में केंद्रीय जांच एजेंसियां निष्पक्ष काम कर रही हैं, या फिर वे किसी खास कॉर्पोरेट विस्तार की ‘स्क्रिप्ट’ लिख रही हैं? यह सवाल आज हम नहीं, बल्कि देश का विपक्ष, स्वतंत्र पत्रकार और वो तमाम उद्योगपति उठा रहे हैं जो पिछले कुछ सालों में एक अजीब से ‘पैटर्न’ का शिकार हुए हैं। आरोप बेहद संगीन हैं—आरोप है कि जिस कंपनी पर देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने यानी ‘अडाणी समूह’ की नजर पड़ती है, अगर वो आसानी से न बिके, तो वहां ED (प्रवर्तन निदेशालय) या CBI की दस्तक हो जाती है। प्रमोटर जेल जाते हैं, अदालत से जमानत मिलने में महीनों लग जाते हैं, और जैसे ही वे बाहर आते हैं या संकट में घिरते हैं, अचानक उस कंपनी का मालिकाना हक अडाणी समूह के पास चला जाता है।
क्या यह महज एक इत्तेफाक है या एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी? आइए तथ्यों, तारीखों और सबूतों के साथ समझते हैं उन प्रमुख कंपनियों का पूरा सच, जो आज अडाणी साम्राज्य का हिस्सा बन चुकी हैं।
1. मुंबई एयरपोर्ट (GVK ग्रुप) – दबाव और सीधे टेकओवर की कहानी
अडाणी समूह के पास आज देश के सबसे आकर्षक हवाई अड्डों (जैसे मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट – MIAL) का नियंत्रण है। लेकिन इसका बैकग्राउंड क्या है?
* क्या था मामला: GVK ग्रुप के पास मुंबई एयरपोर्ट के संचालन का अधिकार था। अडाणी समूह इसे हासिल करना चाहता था, लेकिन शुरुआत में GVK इसे बेचने के मूड में नहीं था।
* एजेंसियों की एंट्री (जून-जुलाई 2020): जून 2020 में CBI ने GVK ग्रुप के चेयरमैन जी. वेंकट कृष्णा रेड्डी और उनके बेटे के खिलाफ ₹705 करोड़ के कथित घोटाले का मामला दर्ज किया। ठीक इसके बाद, जुलाई 2020 में ED ने GVK के दफ्तरों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। प्रमोटर्स पर गिरफ्तारी और भारी कानूनी कार्रवाई की तलवार लटक गई।
* क्लाइमेक्स (अगस्त 2020): ED की रेड के महज एक महीने के भीतर, अगस्त 2020 में GVK ग्रुप ने अचानक घोषणा की कि वे मुंबई एयरपोर्ट में अपनी पूरी हिस्सेदारी अडाणी ग्रुप को बेच रहे हैं।
* बयान का सबूत: बाद में संसद और मीडिया में यह मुद्दा गूंजा। खुद राहुल गांधी ने संसद में आरोप लगाया कि GVK के मालिकों को ED/CBI का डर दिखाकर एयरपोर्ट छीन लिया गया। हालांकि, बाद में भारी दबाव के बीच GVK के प्रमोटर जीवी संजय रेड्डी ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन पर सीधे तौर पर अडाणी का दबाव नहीं था, बल्कि वे कर्ज के कारण बेच रहे थे, लेकिन टाइमिंग (रेड के तुरंत बाद बेचना) आज भी सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
2. कृष्णापटनम पोर्ट (KPCL) और गंगावरम पोर्ट – आंध्र प्रदेश की कहानी
अडाणी पोर्ट्स (APSEZ) का भारत के समुद्र तटों पर एकाधिकार बढ़ता जा रहा है। इसमें आंध्र प्रदेश के दो बड़े पोर्ट्स शामिल हैं।
* कृष्णापटनम पोर्ट (CVR नवयुगा ग्रुप): 2019-20 में नवयुगा ग्रुप पर केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकार की तरफ से कई तरह की जांच और ठेके रद्द होने का दबाव बना। इसके तुरंत बाद, अक्टूबर 2020 में अडाणी पोर्ट्स ने इस पोर्ट में 75% हिस्सेदारी खरीदने की प्रक्रिया पूरी की और बाद में इसे 100% कर लिया।
* गंगावरम पोर्ट (डीवीएस राजू और परिवार): इस पोर्ट के प्रमोटर्स को भी विभिन्न टैक्स और रेगुलेटरी जांचों का सामना करना पड़ा। अप्रैल 2021 तक, अडाणी ने इस पूरे पोर्ट पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया। आलोचकों का आरोप है कि प्रमोटर्स के पास जांच के डर से सरेंडर करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।
3. अंबुजा और एसीसी सीमेंट (होलसिम ग्रुप) – विदेशी कंपनी पर ‘लोकल’ दबाव?
* पृष्ठभूमि: स्विस कंपनी होलसिम (Holcim) भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना चाहती थी। इस रेस में अडाणी के अलावा जेएसडब्ल्यू (JSW) और अल्ट्राटेक जैसी कई बड़ी भारतीय कंपनियां शामिल थीं।
* एजेंसियों का रुख: जब यह डील अंतिम दौर में थी, तब भारत के कॉम्पिटिशन कमीशन (CCI) और अन्य सरकारी विभागों द्वारा सीमेंट सेक्टर में ‘कार्टेलाइजेशन’ (मूल्य निर्धारण में मिलीभगत) को लेकर कड़े तेवर दिखाए गए।
* नतीजा: विदेशी कंपनी किसी भी तरह के कानूनी विवाद से बचना चाहती थी। अंततः मई 2022 में ₹81,000 करोड़ की इस मेगा डील को अडाणी समूह ने जीत लिया और रातों-रात वे भारत के दूसरे सबसे बड़े सीमेंट उत्पादक बन गए।
इस पूरी क्रोनोलॉजी में सबसे दर्दनाक पहलू देश की न्याय व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स पर यह आरोप लगातार लग रहे हैं कि PMLA (विदेशी मुद्रा और धन शोधन निवारण अधिनियम) के तहत विपक्षी नेताओं और उद्योगपतियों को महीनों-सालों तक जेल में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के ही कुछ फैसलों (जैसे विजय मदनलाल चौधरी केस) ने ED को असीमित शक्तियां दे दीं, जहां ‘जमानत नहीं, जेल’ एक नियम बन गया। जब तक प्रमोटर जेल में रहता है, उसकी कंपनी के शेयर क्रैश हो जाते हैं, बिजनेस ठप हो जाता है। ऐसे में जेल की सलाखों के पीछे से अपनी जान और इज्जत बचाने के लिए प्रमोटर्स के पास अपनी सालों की मेहनत की कंपनी को कौड़ियों के भाव बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यही वजह है कि आज सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोग यह कहने पर मजबूर हैं कि क्या देश की अदालतें भी इस क्रोनी कैपिटलिज्म (मित्रवादी पूंजीवाद) के आगे बेबस हो चुकी हैं?
क्या ये सिर्फ व्यावसायिक सौदे हैं, या फिर सत्ता और कॉर्पोरेट का एक ऐसा खतरनाक गठजोड़, जहां एजेंसियों को ‘रिकवरी एजेंट’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है?
अडाणी समूह हमेशा इन आरोपों को खारिज करता आया है और उनका कहना है कि वे नियम और बाजार के मुताबिक ही कंपनियां खरीद रहे हैं। लेकिन जब-जब टाइमिंग को देखा जाएगा—पहले ED का आना, फिर प्रमोटर का टूटना और फिर अडाणी की एंट्री होना—तब-तब लोकतंत्र और निष्पक्ष बाजार (Fair Market) पर सवाल उठते रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि वाकई अडाणी के लिए जमीन तैयार की जा रही है, या यह सिर्फ विपक्ष का एक राजनीतिक नैरेटिव है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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gaurav singh rajput

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