मुफ्त योजनाओं की ‘गारंटी’ या कर्ज के दलदल में धंसता मध्य प्रदेश? जानिए खजाने की हकीकत

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार लोक कल्याण और विकास के दावों के बीच एक बड़े आर्थिक कशमकश से जूझ रही है। जनता को सीधे लाभ पहुंचाने वाली ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त योजनाओं ने जहां एक बड़े वर्ग को राहत दी है, वहीं राज्य के खजाने पर इसका भारी बोझ देखने को मिल रहा है। ब्रांडवाणी समाचार की इस खोजी रिपोर्ट में हम विश्लेषण करेंगे कि इन लोक-लुभावन योजनाओं के पीछे सरकार पर कर्ज का कितना दबाव है और इसका प्रदेश के भविष्य पर क्या असर होने वाला है।

मध्य प्रदेश में इस समय दो प्रकार की योजनाएं समानांतर रूप से चल रही हैं— शिवराज सरकार के समय की पुरानी योजनाएं (जिन्हें मोहन यादव सरकार ने जारी रखा है) और हाल ही में शुरू की गई नई कल्याणकारी योजनाएं।

लाड़ली बहना योजना (सबसे बड़ा वित्तीय भार): पूर्ववर्ती सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना के तहत प्रदेश की करीब 1.29 करोड़ महिलाओं को हर महीने ₹1250 दिए जा रहे हैं। इस अकेले योजना पर सरकार

 

सालाना लगभग ₹19,000 करोड़ खर्च कर रही है।

सस्ता एलपीजी सिलेंडर: लाड़ली बहनों और उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को ₹450 में गैस सिलेंडर देने के लिए सरकार करोड़ों रुपये की सब्सिडी वहन कर रही है।

फ्री राशन और बिजली सब्सिडी: ‘मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना’ (सालाना ₹6000), मुफ्त राशन (केंद्र के सहयोग से), और घरेलू व कृषि बिजली पर दी जाने वाली भारी सब्सिडी पर सालाना हजारों करोड़ रुपये व्यय हो रहे हैं।

नई योजनाएं और विस्तार: डॉ. मोहन यादव सरकार ने हाल के बजटों में युवाओं के लिए ‘इंटर्नशिप योजना’, श्री अन्न (मोटे अनाज) के प्रोत्साहन के लिए नई सब्सिडी, और लाड़ली बहना योजना के दायरे को सुचारू रखने के लिए अतिरिक्त बजटीय आवंटन किए हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष में केवल इन सामाजिक सुरक्षा और मुफ्त/सब्सिडी योजनाओं का कुल अनुमानित व्यय ₹25,000 करोड़ से ₹30,000 करोड़ के बीच बैठता है।

सवाल यह है कि जब खजाने में सीमित राजस्व है, तो इस भारी-भरकम व्यय की भरपाई कहां से हो रही है? जवाब है— बाजार से लिया जाने वाला कर्ज।

वर्तमान कर्ज की स्थिति: मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज का आंकड़ा ₹3.75 लाख करोड़ से ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है।

लोन लेने की रफ्तार: डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में सरकार को हर कुछ महीनों में रिजर्व बैंक (RBI) के माध्यम से ₹2,000 करोड़ से ₹5,000 करोड़ तक के नए लोन उठाने पड़े हैं। पिछले एक वर्ष में ही सरकार ने विभिन्न किश्तों में ₹25,000 करोड़ से अधिक का नया कर्ज लिया है।

लोन क्यों लेना पड़ रहा है?: राज्य का अपना राजस्व लाड़ली बहना, बिजली सब्सिडी और पुरानी योजनाओं के प्रशासनिक खर्चों (वेतन-पेंशन) को पूरा करने में ही खत्म हो जाता है। नतीजतन, नई और पुरानी दोनों प्रकार की योजनाओं को सुचारू रूप से चलाने और ब्याज चुकाने के लिए सरकार को लगातार नया लोन लेना पड़ रहा है।

अर्थशास्त्रियों और नीति विश्लेषकों के अनुसार, इस ‘फ्री मॉडल’ के कारण मध्य प्रदेश का भविष्य दो स्पष्ट मोर्चों पर प्रभावित हो रहा है:

सकारात्मक पक्ष (फौरी राहत):

इन योजनाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी बनी हुई है। गरीब और मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ी है, जिससे बाजारों में मंदी का असर कम हुआ है। महिला सशक्तिकरण और पोषण के स्तर में सुधार देखा गया है।

नकारात्मक पक्ष (दीर्घकालिक संकट):

विकास कार्यों में कटौती: बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं में जाने के कारण नए हाईवे, उद्योगों, सिंचाई परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए पर्याप्त पैसा नहीं बच पा रहा है।

ब्याज का बढ़ता बोझ: आज स्थिति यह है कि सरकार को अपने बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का *ब्याज चुकाने* में खर्च करना पड़ रहा है। यह आने वाली पीढ़ियों पर एक बड़ा वित्तीय बोझ है।

साख पर असर: यदि कर्ज लेने की यही रफ्तार रही, तो भविष्य में राज्य की वित्तीय साख प्रभावित हो सकती है, जिससे नए उद्योगों के आने और निवेश में कमी आ सकती है।

डॉ. मोहन यादव सरकार के सामने इस समय ‘लोकप्रियता’ और ‘वित्तीय अनुशासन’ के बीच संतुलन बनाने की सबसे बड़ी चुनौती है। जनकल्याणकारी योजनाएं गरीबों के लिए जरूरी हैं, लेकिन यदि इनके लिए पूरी तरह कर्ज पर निर्भर रहा गया, तो राज्य का आर्थिक ढांचा कमजोर हो सकता है।

भविष्य में यदि मध्य प्रदेश को ‘कर्जदार राज्य’ के ठप्पे से बचना है, तो सरकार को मुफ्त की योजनाओं को केवल अति-जरूरतमंदों तक सीमित करना होगा और राज्य के स्वयं के आय के स्रोतों को बढ़ाना होगा। अन्यथा, आज की मुफ्त की राहत, कल के बड़े आर्थिक संकट की आहट बन सकती है।

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