
आंदोलनकारियों का आरोप है कि परियोजनाओं से प्रभावित कई परिवारों को भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की प्रक्रिया के दौरान पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उनका कहना है कि अनेक लोगों को समय पर नोटिस नहीं मिले और कई मामलों में उचित मुआवजा भी नहीं दिया गया। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ग्राम सभा और आम सभा की प्रक्रिया का समुचित पालन किए बिना मुआवजा तय किया गया, जिससे कई वास्तविक प्रभावित परिवार लाभ से वंचित रह गए। आंदोलन में शामिल कुछ ग्रामीणों और आदिवासी महिलाओं ने यह भी आरोप लगाए कि पुश्तैनी जमीन छोड़ने के लिए उन पर दबाव बनाया गया। कुछ लोगों ने घूस की मांग किए जाने तथा पुलिस का भय दिखाने जैसे आरोप भी लगाए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और समाचार लिखे जाने तक संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि आंदोलन स्थल पर आवश्यक सुविधाओं की कमी बनी हुई है। उनका आरोप है कि राशन, पेयजल, बिजली और दवाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे आंदोलन में शामिल लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि परियोजनाओं से वास्तविक रूप से प्रभावित परिवारों को न्याय नहीं मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि आंदोलन के दौरान लगाए गए आरोपों के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज जल्द सार्वजनिक किए जाएंगे। उनका कहना है कि जब तक प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
रविवार को आंदोलन स्थल पर विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, समाजसेवी और स्थानीय नागरिक भी पहुंचे और प्रदर्शनकारियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। आंदोलनकारियों ने सरकार और जिला प्रशासन से मांग की कि सभी प्रभावित परिवारों की निष्पक्ष जांच कराकर पात्र लोगों को नियमानुसार मुआवजा और पुनर्वास का लाभ दिया जाए। जिला प्रशासन की ओर से आंदोलनकारियों द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया था। प्रशासन का पक्ष और किसी संभावित जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
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