
पन्ना: पुण्यप्रताप सिंह परमार की खास रिपोर्ट: पन्ना जिले के हरदुआ केन स्थित जेके सीमेंट कंपनी द्वारा शुरू किए गए जेके स्कूल को लेकर क्षेत्र में नई बहस छिड़ गई है। स्कूल के शुभारंभ के बाद जहां लोगों को बेहतर शिक्षा मिलने की उम्मीद जगी थी, वहीं अब इसकी फीस संरचना को लेकर ग्रामीणों और अभिभावकों में असंतोष देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय में निर्धारित शुल्क सामान्य किसान, मजदूर और सीमित आय वाले परिवारों की पहुंच से काफी दूर है। उनका आरोप है कि यदि शिक्षा इतनी महंगी होगी तो ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाएंगे।
स्कूल के उद्घाटन समारोह में जिले के तीनों विधायक, खजुराहो लोकसभा सांसद तथा अन्य जनप्रतिनिधि शामिल हुए थे। लेकिन अब स्थानीय लोगों का कहना है कि उद्घाटन के समय किसी भी जनप्रतिनिधि ने क्षेत्र के गरीब और किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए फीस कम करने या विशेष रियायत की मांग नहीं उठाई। ग्रामीणों का कहना है कि जिस क्षेत्र की जमीन पर उद्योग स्थापित किया गया है, उसी क्षेत्र के लोगों के बच्चों को सस्ती और सुलभ शिक्षा मिलनी चाहिए।
विद्यालय द्वारा जारी फीस संरचना के अनुसार नर्सरी एवं एलकेजी की वार्षिक ट्यूशन फीस ₹19,050 निर्धारित की गई है, जबकि यूकेजी के लिए ₹22,650, कक्षा पहली और दूसरी के लिए ₹26,700, कक्षा तीसरी से पांचवीं तक ₹30,300 तथा कक्षा छठी से आठवीं तक ₹36,300 वार्षिक ट्यूशन फीस तय की गई है। यह केवल ट्यूशन फीस है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विद्यार्थी से ₹200 प्रॉस्पेक्टस शुल्क, ₹5,000 नॉन-रिफंडेबल रजिस्ट्रेशन फीस तथा ₹8,000 नॉन-रिफंडेबल एडमिशन फीस ली जा रही है। इसके अलावा बस शुल्क, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य शैक्षणिक खर्च भी अलग से देना होगा। ऐसे में एक बच्चे की शिक्षा पर कुल वार्षिक खर्च काफी अधिक हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि पन्ना एक कृषि प्रधान और पिछड़ा जिला है, जहां अधिकांश परिवार खेती, मजदूरी या छोटे व्यवसाय पर निर्भर हैं। ऐसे परिवारों के लिए इतनी अधिक फीस जमा करना आसान नहीं है। उनका कहना है कि यदि किसी परिवार के दो या तीन बच्चे इस विद्यालय में पढ़ते हैं तो सालाना शिक्षा का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है, जो सामान्य परिवारों के लिए संभव नहीं है।
ग्रामीणों ने विशेष रूप से ₹13,000 की नॉन-रिफंडेबल रजिस्ट्रेशन और एडमिशन फीस पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इसे घटाकर ₹5,000 किया जाना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों का प्रवेश विद्यालय में करा सकें। उनका तर्क है कि यदि बड़ी संख्या में विद्यार्थियों से नॉन-रिफंडेबल शुल्क लिया जाता है तो यह अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालता है।
कुछ स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि यदि विद्यालय में लगभग एक हजार विद्यार्थियों का प्रवेश होता है तो केवल नॉन-रिफंडेबल शुल्क के माध्यम से बड़ी राशि एकत्र हो जाएगी, जबकि इसके अतिरिक्त ट्यूशन फीस, परिवहन शुल्क, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य शुल्क भी अलग से लिए जाएंगे। उनका मानना है कि इस व्यवस्था पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भी ध्यान देना चाहिए।
ग्रामीणों ने जिला शिक्षा अधिकारी और जिला कलेक्टर से मांग की है कि विद्यालय की फीस संरचना की समीक्षा कराई जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि निजी विद्यालयों में शुल्क निर्धारण शासन के नियमों के अनुरूप हो। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर, किसान और मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति, शुल्क में विशेष छूट या अन्य सहायता योजना लागू करने पर विचार किया जाए।
स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने निजी विद्यालयों द्वारा मनमानी फीस वसूली पर सख्त कार्रवाई की बात कही थी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार निजी स्कूलों की फीस को लेकर गंभीर है तो इस मामले की भी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
हालांकि, जेके स्कूल प्रबंधन का पक्ष इस संबंध में सामने नहीं आया है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि विद्यालय द्वारा निर्धारित शुल्क संबंधित नियमों के अनुरूप है या नहीं। ऐसे में इस मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित प्रशासनिक जांच और स्कूल प्रबंधन के आधिकारिक पक्ष के बाद ही सामने आएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य बेहतर शिक्षा का विरोध करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग तक सीमित न रह जाए। उनका मानना है कि यदि फीस में राहत, छात्रवृत्ति या विशेष रियायत की व्यवस्था की जाए तो क्षेत्र के अधिक से अधिक गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चे भी इस विद्यालय में पढ़कर बेहतर भविष्य बना सकेंगे।
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