
बुरहानपुर: देशभर में स्वतंत्रता दिवस और आज़ादी के अमृत वर्ष के तहत स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी बीच मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सरकारी व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के निशुल्क पाठ्य पुस्तक भंडार के जर्जर भवन में महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद सहित अन्य महापुरुषों के चित्र कबाड़ के बीच धूल खाते मिले। मामला सामने आने के बाद जिम्मेदारी को लेकर अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप लगाते नजर आए, जबकि जिला परियोजना अधिकारी ने जांच कर कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
जानकारी के अनुसार, जिस भवन में पहले विद्यालय का संचालन होता था, वहां वर्तमान में निशुल्क पाठ्य पुस्तकों का संग्रहण और वितरण किया जा रहा है। इसी भवन में महापुरुषों के चित्र कबाड़ के बीच पड़े मिले, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान में पूरा देश कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, उनके चित्रों का इस तरह उपेक्षित अवस्था में मिलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।
मामले में संकुल प्राचार्य शैलेन्द्र हजारी ने बताया कि विद्यालय ने करीब पांच वर्ष पहले ही जर्जर भवन को छोड़ दिया था। भवन की खराब स्थिति की जानकारी विभाग को पहले ही दे दी गई थी और वर्तमान में वहां विद्यालय का कोई संचालन नहीं होता। उनके अनुसार अब इस परिसर में पुस्तकों का संग्रहण और वितरण बीआरसी एवं डीसी कार्यालय द्वारा किया जा रहा है, इसलिए इसकी जिम्मेदारी विद्यालय की नहीं है।
वहीं निशुल्क पाठ्य पुस्तक भंडार के प्रभारी बीआरसी उदय सिंह ने दूरभाष पर बताया कि उनकी जिम्मेदारी केवल पुस्तकों के रखरखाव तक सीमित है। महापुरुषों के चित्र कबाड़ में कैसे पहुंचे, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उन्होंने इस संबंध में विद्यालय प्रबंधन को जिम्मेदार बताया। मामला जिला परियोजना अधिकारी तक पहुंचने पर उन्होंने इसे गंभीर और शर्मनाक बताते हुए कहा कि पूरे प्रकरण की जांच कर संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब देश स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद कर राष्ट्रीय गौरव का उत्सव मना रहा है। ऐसे में सरकारी परिसर में महापुरुषों के चित्रों का कबाड़ के बीच पड़े मिलना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान और संवेदनाओं पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
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