
प्रदेश की अफसरशाही में एक जांच आयोग इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह है जांच की लंबी अवधि और सरकारी खर्च। चर्चा है कि भ्रष्टाचार के एक चर्चित मामले की जांच के लिए तत्कालीन सरकार ने एक सदस्यीय जांच आयोग बनाया था। इसकी जिम्मेदारी एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को दी गई थी। लेकिन करीब छह साल गुजरने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है।
सरकारी खजाने से खर्च के बाद भी नतीजे का इंतजार
मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि आयोग की जांच पर अब तक लाखों रुपये सरकारी खजाने से खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद अंतिम रिपोर्ट का इंतजार बना हुआ है। इस बीच जिस मामले की जांच हो रही है, उसमें अदालत से स्थगन आदेश मिलने की बात भी सामने आ रही है। जांच के दायरे में रहे कुछ अधिकारी भी अब सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
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तारीख आती है, सुनवाई का इंतजार रहता है
अफसरशाही में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश राजधानी से करीब 200 किलोमीटर दूर रहते हैं। तय तारीख पर उनके राजधानी आने और सरकारी व्यवस्था के तहत ठहरने की बात कही जा रही है। आरोप यह भी हैं कि कई मौकों पर सुनवाई में संबंधित पक्षकार उपस्थित नहीं होते। ऐसे में दिन औपचारिक प्रक्रिया में निकल जाता है और सुनवाई आगे की तारीख तक टल जाती है।
पूर्व मुख्य सचिव से करीबी की भी चर्चा
मंत्रालय के गलियारों में यह चर्चा भी है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश की पूर्व मुख्य सचिव से नजदीकी रही है। इसी वजह से सरकार की ओर से आयोग को लेकर नरमी बरते जाने की बातें भी कही जा रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई है।
अब सवाल जांच पूरी होने का
छह साल बाद भी जांच पूरी नहीं होने से आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर जांच की अंतिम रिपोर्ट कब आएगी और सरकारी खर्च का हिसाब जनता के सामने कब आएगा? फिलहाल मंत्रालय के गलियारों में तंज यही सुनाई दे रहा है-“जांच से ज्यादा लंबी तो उसकी तारीखें हो गई हैं!”
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