
बमौरी/ मोहित सोनी: हमारी संस्कृति में पेड़ों को लेकर कही जाने वाली यह बात “एक पेड़ सौ पुत्रों के समान” आज बमौरी के जंगलों में सवाल बनकर खड़ी दिखाई दे रही है। गुना जिले के बमौरी क्षेत्र में जंगलों में पेड़ों की कथित कटाई को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और समाजसेवियों ने चिंता जताई है। आरोप है कि लंबे समय से जारी पेड़ों की कटाई के कारण कई इलाकों में जंगलों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और हरे-भरे क्षेत्र उजड़ते जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब वन विभाग की जिम्मेदारी जंगलों की सुरक्षा और अवैध कटाई पर रोक लगाने की है, तो इसके बावजूद पेड़ों की कटाई की शिकायतें लगातार क्यों सामने आ रही हैं? ग्रामीणों ने प्रशासन से मामले की गंभीरता से जांच कर जंगलों को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।
जंगलों में चल रही कथित अंधाधुंध कटाई
स्थानीय लोगों के अनुसार बमौरी क्षेत्र के कई वन क्षेत्रों में हरे पेड़ों की कटाई को लेकर लंबे समय से चिंता बनी हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि जंगलों में सक्रिय कथित वन माफिया पेड़ों को काटकर इलाके की हरियाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों का प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि इनके साथ वन्यजीव, जैव विविधता और स्थानीय पर्यावरण भी जुड़ा होता है।
वन विभाग की मौजूदगी के बावजूद सवाल
सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाया जा रहा है। जिले से लेकर स्थानीय बीट स्तर तक वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी तैनात हैं। इसके बावजूद यदि जंगलों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है, तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय निवासियों और समाजसेवियों का आरोप है कि विभाग की प्रभावी निगरानी के अभाव में पेड़ काटने वालों के हौसले बढ़ रहे हैं। कुछ लोगों ने कथित मिलीभगत के भी आरोप लगाए हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
ऐसे में यह जरूरी है कि संबंधित अधिकारी क्षेत्र का भौतिक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सामने लाएं और यदि अवैध कटाई पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करें।
कार्रवाई और पौधरोपण के दावों पर भी सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि जब भी जंगलों में पेड़ों की कटाई को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तो विभाग की ओर से कार्रवाई और पौधरोपण की बात कही जाती है। लेकिन लोगों का सवाल इससे आगे का है।
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जो तंत्र वर्षों पुराने बड़े पेड़ों की सुरक्षा नहीं कर पा रहा, वह नए लगाए गए छोटे पौधों को कैसे सुरक्षित रखेगा? पौधरोपण के बाद उनकी देखरेख, पानी, सुरक्षा और उनके जीवित रहने की निगरानी की व्यवस्था क्या है—इन सवालों का जवाब भी जरूरी है।
केवल पौधे लगाने से जंगल तैयार नहीं होता। उसके लिए वर्षों तक संरक्षण और निगरानी की आवश्यकता होती है।
दशकों में तैयार हुए जंगलों को बचाने की चुनौती
बड़े पेड़ों को तैयार होने में कई वर्ष लगते हैं। एक पुराने पेड़ को काटने के बाद उसकी जगह पौधा लगा देना तत्काल तौर पर उस पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।
जंगलों की कटाई का असर मिट्टी, जल स्रोतों, तापमान और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी पड़ सकता है। ऐसे में बमौरी क्षेत्र में सामने आ रही शिकायतों को केवल पेड़ों की कटाई का मामला मानने के बजाय पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर देखना जरूरी है।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल
स्थानीय स्तर पर जंगलों की कथित कटाई को लेकर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों और समाजसेवियों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों को प्रशासन के सामने आवाज उठानी चाहिए।
हालांकि, जनप्रतिनिधियों की ओर से इस मामले में क्या रुख है, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है। ऐसे में किसी पर आरोप तय करने के बजाय यह जरूरी है कि स्थानीय प्रतिनिधि और प्रशासन जंगलों की स्थिति पर सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखें।
ग्रामीणों ने लगाई जंगल बचाने की गुहार
स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण को लेकर चिंतित लोगों ने प्रशासन से बमौरी के जंगलों की निगरानी बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि जंगलों को बचाने के लिए केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीन पर लगातार निगरानी और कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए।
ग्रामीणों की मांग है कि जिन क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहां विशेष निरीक्षण कराया जाए। साथ ही कटे हुए पेड़ों की संख्या, कटाई की अनुमति और संबंधित कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक की जाए।
अब जांच और जवाब का इंतजार
बमौरी में जंगलों की कथित कटाई को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब निगाह वन विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर है। यदि शिकायतों में तथ्य हैं तो पेड़ों की कटाई के पीछे कौन लोग हैं, कितने पेड़ काटे गए और जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई—इन सभी सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
वहीं यदि लगाए जा रहे आरोप तथ्यहीन हैं तो वन विभाग को भी वास्तविक स्थिति सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
नोट: इस रिपोर्ट में वन कटाई, वन माफिया और विभागीय अनदेखी/मिलीभगत से जुड़े आरोप स्थानीय लोगों एवं समाजसेवियों द्वारा लगाए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। वन विभाग और संबंधित प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।
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