नौकरशाही की ‘छतरी’ और जांच एजेंसियों की चुप्पी, पूर्व एसीएस की जमीन पर कोरोना सिंडिकेट का अस्पताल, फिर भी कार्रवाई से क्यों बच रहे जिम्मेदार?

आज हम उस कड़वे सच पर से पर्दा उठा रहे हैं, जिसे प्रशासनिक फाइलों के भारी-भरकम बस्तों के नीचे दबाने की पूरी कोशिश की गई है।

जब पूरा देश और मध्य प्रदेश कोरोना महामारी की सबसे भयानक त्रासदी से जूझ रहा था, जब आम इंसान अपनी जान बचाने के लिए एक-एक सांस, एक-एक इंजेक्शन और अस्पताल के एक अदद बिस्तर के लिए दर-दर भटक रहा था, ठीक उसी वक्त मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोग और उनके चहेते कारोबारी आपदा को अवसर में बदल रहे थे।

लेकिन आज की सबसे बड़ी खबर सिर्फ यह नहीं है कि आपदा में मुनाफा किसने कमाया। आज की सबसे बड़ी पड़ताल यह है कि सबूत सामने होने के बावजूद मध्य प्रदेश की जांच एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी हैं? ईओडब्ल्यू (EOW), लोकायुक्त और आयकर विभाग की नजरें इस खुली साठगांठ पर क्यों नहीं पड़ रहीं?

मध्य प्रदेश के पूर्व अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) मोहम्मद सुलेमान की पारिवारिक जमीन पर उन्हीं वेंडरों और सप्लायरों का मल्टी-सुपरस्पेशलिटी अस्पताल आकार ले रहा है, जिन्होंने कोरोना काल में करोड़ों-अरबों के सरकारी ठेके हासिल किए। सरकारी खसरा नंबर, डायवर्सन की तारीखें, और कंपनियों के नाम चीख-चीख कर ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी ‘लाभ के बदले लाभ’ की कहानी कह रहे हैं।

फिर भी कोई एफआईआर नहीं, कोई प्राथमिक जांच नहीं, कोई नोटिस तक नहीं! आखिर कौन दे रहा है इस गठजोड़ को संरक्षण? क्या पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कानून के हाथ बंध जाते हैं? देखिए हमारी यह विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट।”

राजधानी भोपाल का सबसे महंगा और पॉश इलाका—बावड़िया कलां। कोलार तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम बावड़िया कलां के पटवारी हल्का के सरकारी भू-अभिलेख जब खंगाले गए, तो जो सच सामने आया उसने प्रशासनिक शुचिता के तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दीं।

  • खसरा क्रमांक 9/2/8 (स):
    • क्षेत्रफल: 0.1010 हेक्टेयर (लगभग 10,871 वर्ग फुट)।
    • दर्ज भू-स्वामी: श्री मोहम्मद सुलेमान (पूर्व स्वास्थ्य एसीएस) और उनकी पत्नी श्रीमती सीमा सुलेमान।
    • निर्धारित उपयोग: सरकारी दस्तावेजों में यह जमीन आज भी ‘आवासीय’ दर्ज है।
    • आदेश विवरण: न्यायालय तहसीलदार, प्रकरण क्रमांक 1013/अ-6/2023-24, आदेश दिनांक 28 जुलाई 2023।
    • डायवर्सन पुष्टि: चालान क्रमांक 051/9999999/0029/03/25/046193 के माध्यम से 22,220 रुपये 6 मार्च 2025 को जमा किए गए और मात्र 48 घंटे के भीतर 8 मार्च 2025 को उपखंड अधिकारी (SDO) द्वारा इस पर मुहर लगा दी गई।
  • संलग्न खसरा क्रमांक 9/2/9 (स):
    • क्षेत्रफल: 0.1010 हेक्टेयर।
    • दर्ज भू-स्वामी: श्री ज्ञानेन्द्र सिंह और श्रीमती लक्ष्मी सिंह।
    • आदेश विवरण: न्यायालय तहसीलदार, प्रकरण क्रमांक 3447/अ-6/2023-24, आदेश दिनांक 29 जनवरी 2024।
    • डायवर्सन पुष्टि: ठीक उसी दिन यानी 6 मार्च 2025 को 22,220 रुपये का चालान और 8 मार्च 2025 को ही सक्षम अधिकारी की मंजूरी।

वॉइन दोनों भूखंडों का कुल रकबा लगभग आधी एकड़ से अधिक बैठता है। जिस रफ्तार से फाइलें चलीं, वह आम जनता के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। एक आम नागरिक अपने घर की रजिस्ट्री, नामांतरण या डायवर्सन के लिए महीनों तक कलेक्ट्रेट और तहसील के चक्कर काटता है, बाबू से लेकर साहब तक की खुशामद करता है, लेकिन यहां पूर्व एसीएस और उनके साझीदारों की फाइलें बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ती हैं।

सबसे बड़ा विधिक सवाल: जब राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का उपयोग ‘आवासीय’ दर्ज है, तो वहां एक फाइव-स्टार कमर्शियल अस्पताल का विशाल ढांचा कैसे खड़ा हो रहा है? नगर निगम भोपाल, टीएंडसीपी (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने किस नियम के तहत इस व्यावसायिक निर्माण की अनुमति दी? या फिर पूर्व एसीएस के रसूख के आगे सभी विभागों ने अपनी आंखें मूंद लीं?

वर्ष 2020 और 2021 की उस त्रासदी को याद कीजिए। चारों तरफ एंबुलेंस के सायरन, श्मशानों में कतारें और दवाओं के लिए बिलखते परिजन। उस वक्त मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के नीतिगत फैसलों की कमान अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान के हाथों में थी। आपदा प्रबंधन के नाम पर आपातकालीन वित्तीय अधिकारों का प्रयोग करते हुए बिना सामान्य टेंडर प्रक्रियाओं के करोड़ों रुपये के वर्क ऑर्डर जारी किए गए।

इन अनुबंधों के मुख्य लाभार्थी कौन थे?

  1. सीटी स्कैन मशीन आपूर्तिकर्ता: सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में सीटी स्कैन मशीनों की आपूर्ति और संचालन के नाम पर चुनिंदा निजी कंपनियों को उपकृत किया गया।
  2. डायग्नोस्टिक लैब सिंडिकेट: आरटी-पीसीआर और पैथोलॉजी जांचों के लिए मनमानी दरों पर निजी लैब्स को अधिकृत किया गया और भारी-भरकम भुगतान सरकारी खजाने से किए गए।
  3. दवा और मेडिकल लॉजिस्टिक्स वेंडर: आपातकालीन चिकित्सा उपकरणों, पीपीई किट्स और दवाओं की आपूर्ति में जिस समूह पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे, उसे बार-बार संरक्षण दिया गया।

अब जरा कड़ियों को जोड़िए। जो कारोबारी 2020-21 में स्वास्थ्य विभाग के एसीएस के दफ्तर से करोड़ों के बिल पास करवा रहे थे, वे 2024-25 में उसी एसीएस की निजी जमीन पर फाइव-स्टार अस्पताल के साझेदार बन जाते हैं!

कानून की भाषा में इसे क्या कहते हैं? क्या यह सीधे तौर पर ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी उपकार के बदले आर्थिक लाभ का मामला नहीं है? यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि करोड़ों कमाने वाले वही तीन वेंडर ठीक उसी जमीन पर पूंजी लगाते हैं, जिसका मालिकाना हक पूर्व स्वास्थ्य प्रमुख और उनके परिवार के पास है।

“अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे चुभते हुए पहलू पर। अगर किसी पटवारी, क्लर्क या छोटे डॉक्टर के घर से आय से अधिक संपत्ति की एक रसीद भी मिल जाए, तो लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की टीमें अगले दिन तड़के दबिश दे देती हैं। प्रेस नोट जारी होते हैं, मीडिया ट्रायल शुरू हो जाता है।

लेकिन यहां मध्य प्रदेश के एक रिटायर्ड शीर्ष आईएएस अधिकारी की जमीन, कोरोना काल के बड़े वेंडरों की साझेदारी, और करोड़ों का आलीशान अस्पताल खुलेआम सामने है। इसके बावजूद शासन, प्रशासन और जांच एजेंसियां पूरी तरह से खामोश क्यों हैं?

कार्रवाई न होने के पीछे के चार मुख्य कारण समझिए:

1. ब्यूरोक्रेटिक सिंडिकेट और प्रशासनिक संरक्षण

मोहम्मद सुलेमान मध्य प्रदेश कैडर के सबसे ताकतवर और प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते रहे हैं। वर्षों तक स्वास्थ्य, योजना और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों में रहने के कारण प्रशासनिक गलियारों में उनका रसूख आज भी कायम है। वर्तमान में जांच एजेंसियों और शासन के अहम पदों पर बैठे कई वरिष्ठ अधिकारी कभी उनके मातहत काम कर चुके हैं। यह ‘ब्यूरोक्रेटिक नेक्सस’ अपने ही पूर्व बॉस के खिलाफ किसी भी तरह की प्राथमिक जांच (PE) दर्ज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

2. राजनीतिक सांठगांठ और राजनेताओं की चुप्पी

कोरोना काल में स्वास्थ्य विभाग के फैसलों पर सिर्फ नौकरशाहों के नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व के भी हस्ताक्षर थे। यदि मोहम्मद सुलेमान और कोरोना वेंडरों के वित्तीय रिश्तों की जांच निष्पक्ष रूप से शुरू होती है, तो जांच की आंच उस दौर के कई रसूखदार नेताओं और मंत्रियों तक पहुंचेगी। यही कारण है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों इस संवेदनशील मामले पर एक रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं।

3. सिविल सेवा आचरण नियमों की खुली अनदेखी

‘ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968’ के तहत किसी भी आईएएस अधिकारी को अपने कार्यकाल के दौरान या सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद उन कंपनियों या व्यक्तियों के साथ व्यावसायिक संबंध स्थापित करने पर सख्त पाबंदी है, जिन्हें उनके विभाग से लाभ पहुंचा हो। यह सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत संज्ञेय अपराध बनता है। लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग ने आज तक इस मामले में एक कारण बताओ नोटिस तक जारी नहीं किया।

4. मनी ट्रेल और बेनामी निवेश की अनदेखी

इस फाइव-स्टार अस्पताल के निर्माण में लग रहे करोड़ों रुपये का स्रोत क्या है? क्या यह वही धन है जिसे महामारी के दौरान सरकारी खजाने से निकाला गया और अब उसे रियल एस्टेट और अस्पताल इंफ्रास्ट्रक्चर में व्हाइट किया जा रहा है? आयकर विभाग की बेनामी संपत्ति निषेध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय को जो जांच प्राथमिकता के आधार पर करनी चाहिए थी, उस पर अभी तक एक कागजी प्रक्रिया भी शुरू नहीं हुई है।”

जनता आज यह पूछने का हक रखती है कि जब वह ऑक्सीजन सिलेंडरों के लिए ब्लैक मार्केट में ठगी जा रही थी, जब अस्पतालों में अपनों की लाशें देखकर लोग चीख रहे थे, तब सरकारी तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग क्या अपने भविष्य के ‘फाइव-स्टार हॉस्पिटल्स’ की नींव तैयार कर रहे थे?

स्क्रीन पर बड़े ग्राफिक्स में सवाल:

  1. लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू बताएं: सार्वजनिक डोमेन में खसरा दस्तावेज और साक्ष्य उपलब्ध होने के बाद भी अब तक सुओ-मोटो (स्वप्रेरणा से) संज्ञान लेकर जांच क्यों नहीं शुरू की गई?
  2. सामान्य प्रशासन विभाग स्पष्ट करे: क्या एक पूर्व एसीएस को अपने ही विभाग के वेंडरों के साथ मिलकर निजी अस्पताल खड़ा करने की वैधानिक छूट मिली हुई है?
  3. कलेक्टर और नगर निगम प्रशासन जवाब दें: आवासीय भूमि पर बिना पूर्ण डायवर्सन और वैधानिक अनुमतियों के इतना बड़ा व्यावसायिक निर्माण किसकी शह पर हो रहा है?

“दस्तावेज कभी झूठ नहीं बोलते। खसरे के कॉलम में दर्ज मोहम्मद सुलेमान और उनके साझीदारों के नाम केवल अक्षरों का समूह नहीं हैं, यह उस व्यवस्था का चेहरा हैं जहां ताकतवर लोगों के लिए कानून के तराजू बदल जाते हैं।

यदि मध्य प्रदेश सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति पर वाकई विश्वास करती है, तो मुख्यमंत्री और गृह विभाग को तत्काल इस पूरे प्रोजेक्ट पर रोक लगाते हुए एक स्वतंत्र न्यायिक जांच या सीबीआई जांच की अनुशंसा करनी चाहिए। महामारी की पीड़ा पर बने इस साम्राज्य की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। जब तक जांच शुरू नहीं होती और जिम्मेदार कठघरे में नहीं खड़े किए जाते, हम यह सवाल पूछते रहेंगे।

देखते रहिए हमारी यह विशेष पड़ताल—सच के साथ, बिना किसी खौफ के।”

gaurav singh rajput

gaurav singh rajput

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