
ग्वालियर, 6 अक्टूबर 2026। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने एक संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान निचली अपीलीय अदालत की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्यों के एक कम उम्र की महिला सदस्य पर मुकदमे से जुड़े काम के लिए निर्भर होने पर सवाल उठाया गया था। हाईकोर्ट ने इस सोच को लैंगिक पूर्वाग्रह वाला और महिला की क्षमता को कमतर आंकने वाला बताया। न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला ने 1 अक्टूबर 2026 को मामले में दूसरी अपील स्वीकार करते हुए विवाद को दोबारा प्रथम अपीलीय अदालत के पास भेज दिया।
18 दिन की देरी के चलते खारिज हुई थी अपील
मामला विदिशा जिले के गंजबासौदा से जुड़ा है। संपत्ति विवाद में अपीलकर्ताओं ने दावा किया था कि संबंधित संपत्ति पैतृक है और उसमें उनका हिस्सा है। ट्रायल कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2011 को यह कहते हुए मूल वाद खारिज कर दिया था कि संपत्ति के पैतृक होने का दावा साबित नहीं किया जा सका।
इसके बाद अपीलकर्ताओं ने प्रथम अपील दायर की, लेकिन वह 18 दिन की देरी से दाखिल हुई। देरी माफ कराने के लिए दायर आवेदन में बताया गया कि परिवार की ओर से मुकदमे की कार्यवाही देख रही मोहऱ बाई की तबीयत खराब थी। उनकी बीमारी के कारण समय पर अपील दाखिल नहीं हो सकी।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, गंजबासौदा ने देरी के लिए दिए गए कारणों को स्वीकार नहीं किया और 17 दिसंबर 2014 को अपील को समय-सीमा के आधार पर खारिज कर दिया। मामले के गुण-दोष पर सुनवाई नहीं हुई।
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महिला की भूमिका पर टिप्पणी से हाईकोर्ट नाराज
हाईकोर्ट के सामने यह भी आया कि निचली अपीलीय अदालत ने महिला की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा था कि परिवार के अन्य सदस्य उससे उम्र में बड़े और पुरुष थे, इसलिए उनके उस महिला पर मुकदमे से जुड़े जरूरी कदम उठाने के लिए निर्भर होने की बात स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को कानूनी रूप से उचित नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी महिला की उम्र या लिंग के आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि परिवार के दूसरे सदस्य उस पर कानूनी प्रक्रिया के लिए निर्भर नहीं हो सकते। अदालत ने रिकॉर्ड में इस धारणा का कोई आधार भी नहीं पाया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बीमारी के आधार पर देरी की वजह को केवल दस्तावेज नहीं होने के कारण खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक संबंधित पक्ष को अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य पेश करने का अवसर न दिया गया हो। हाईकोर्ट के अनुसार पहले अपीलीय अदालत ने ऐसा अवसर दिए बिना ही देरी के कारण को खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट ने मामला वापस प्रथम अपीलीय अदालत को भेजा
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दूसरी अपील स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय अदालत का आदेश रद्द कर दिया और मामले को वापस भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि पक्षकारों को धारा 5, परिसीमा अधिनियम के तहत देरी माफ करने के आवेदन पर साक्ष्य पेश करने का अवसर दिया जाए।
इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत को मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर देरी माफ करने के आवेदन पर निर्णय लेना होगा। यदि देरी माफ की जाती है, तो अपील पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला करना होगा।
अदालत ने पक्षकारों को 15 अक्टूबर 2026 को प्रथम अपीलीय अदालत के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश भी दिया है।
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