
भारत डायनेमिक्स लिमिटेड से जुड़ी एक खरीद प्रक्रिया इन दिनों सवालों के घेरे में है। भारतीय एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक, कंपनी ने 300 मिसाइल उपकरणों की खरीद के लिए एक ही निजी कंपनी को निविदा में शामिल किया। इस कंपनी की स्थापना भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ मिश्रा और उनकी पत्नी शांभवी मिश्रा ने की थी। कंपनी ने इस निविदा में 56.8 करोड़ रुपये की कीमत पेश की है। हालांकि, अभी अंतिम वित्तीय मूल्यांकन पूरा नहीं हुआ है। इसलिए इसे अंतिम ठेका मिलना कहना जल्दबाजी होगी।
300 उपकरणों की खरीद में सिर्फ एक कंपनी क्यों?
मामला 300 दृष्टि उपकरणों की खरीद से जुड़ा है। इन उपकरणों का इस्तेमाल टैंक रोधी निर्देशित मिसाइलों में लक्ष्य को पहचानने, देखने और निशाना साधने के लिए किया जाता है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने मई 2026 में ऐंद्रि डिफेंस एडवाइजरी प्राइवेट लिमिटेड को एकल निविदा के जरिए खरीद प्रक्रिया में शामिल किया।
एकल निविदा का मतलब है कि खरीद के लिए प्रतिस्पर्धा में केवल एक ही कंपनी को मौका दिया गया। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने इसके पीछे तत्काल आवश्यकता का हवाला दिया है। लेकिन जांच रिपोर्ट के मुताबिक, तत्काल आवश्यकता की वजह क्या थी, इसका विस्तृत कारण सार्वजनिक दस्तावेजों में स्पष्ट नहीं किया गया है। यही इस मामले का पहला बड़ा सवाल है।
पूर्व अधिकारी से कंपनी के रिश्ते ने बढ़ाई चिंता
ऐंद्रि डिफेंस एडवाइजरी की स्थापना मई 2024 में सिद्धार्थ मिश्रा और उनकी पत्नी शांभवी मिश्रा ने की थी। दोनों के पास शुरुआत में कंपनी की बराबर हिस्सेदारी थी। सिद्धार्थ मिश्रा मार्च 2023 में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
बाद में उन्होंने कंपनी से अपनी हिस्सेदारी हटा ली। वर्तमान में शांभवी मिश्रा के पास कंपनी की 95 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस सरकारी रक्षा कंपनी की कमान संभालने वाले पूर्व अधिकारी ने सेवानिवृत्ति के बाद एक निजी कंपनी बनाई, उसी कंपनी को कुछ समय बाद उसी सरकारी रक्षा प्रतिष्ठान से एकल निविदा के जरिए करोड़ों रुपये की खरीद का अवसर कैसे मिला? यह सवाल अपने आप में हितों के टकराव की आशंका पैदा करता है, हालांकि इससे किसी अनियमितता का स्वतः प्रमाण नहीं मिलता।
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पहले प्रतिस्पर्धा थी, इस बार प्रक्रिया क्यों बदली?
इस मामले में पिछले वर्षों की खरीद प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। 2024 और 2025 में इसी तरह के दृष्टि उपकरणों की खरीद प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए हुई थी। दोनों वर्षों में सरकारी क्षेत्र की कंपनियों को निविदा में शामिल किया गया था और India Optel Limited ने खरीद हासिल की थी।
लेकिन 2026 की प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा का दायरा बदल गया। इस बार केवल ऐंद्रि डिफेंस एडवाइजरी को निविदा में शामिल किया गया। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने इसके लिए तत्काल आवश्यकता को आधार बताया। ऐसे में सवाल है कि पिछले दो वर्षों में जब प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से खरीद संभव थी, तो इस बार ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं कि सिर्फ एक कंपनी को मौका देना जरूरी हो गया?
कंपनी की क्षमता और कार्यालय को लेकर भी सवाल
भारतीय एक्सप्रेस की जमीनी पड़ताल में ऐंद्रि डिफेंस एडवाइजरी का हैदराबाद स्थित कार्यालय बंद मिला। कंपनी ने अप्रैल 2026 में राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम परिसर में लगभग 1,050 वर्ग फुट की जगह किराए पर ली थी। कंपनी के पुराने पंजीकृत पते पर भी जांच के दौरान कोई सक्रिय कार्यालय नहीं मिला।
कंपनी के 2024-25 के उपलब्ध वित्तीय रिकॉर्ड के मुताबिक उसका राजस्व करीब 44.43 लाख रुपये और मुनाफा करीब 2.89 लाख रुपये था। रिकॉर्ड में विनिर्माण संयंत्र, जमीन या अन्य बड़ी संपत्तियां दर्ज नहीं थीं। यह जानकारी अपने आप में कंपनी को अयोग्य साबित नहीं करती, लेकिन 56.8 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद के लिए उसकी उत्पादन और आपूर्ति क्षमता की जांच किस तरह हुई, यह महत्वपूर्ण सवाल जरूर बनता है।
क्या इसे घोटाला कहना जल्दबाजी होगी?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस पूरे मामले को सीधे घोटाला या भ्रष्टाचार कहना उचित नहीं होगा। कंपनी तकनीकी मूल्यांकन में सफल हो चुकी है और उसकी वित्तीय बोली का मूल्यांकन अभी चल रहा है। साथ ही, किसी जांच एजेंसी द्वारा भ्रष्टाचार साबित किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।
लेकिन सवाल गंभीर हैं-एकल निविदा क्यों दी गई? तत्काल आवश्यकता का आधार क्या था? पूर्व भारत डायनेमिक्स प्रमुख से जुड़ी कंपनी को ही अवसर देने की प्रक्रिया क्या थी? और पिछले वर्षों की प्रतिस्पर्धी खरीद से इस बार की प्रक्रिया अलग क्यों रही? इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने पर ही यह पता चलेगा कि यह केवल तत्काल आवश्यकता के कारण अपनाई गई खरीद प्रक्रिया थी या इसमें नियमों और पारदर्शिता की किसी कमी की गुंजाइश बनी।
रक्षा क्षेत्र में होने वाली करोड़ों रुपये की खरीद में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। यहां मुद्दा केवल 56.8 करोड़ रुपये की बोली का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसके जरिए एक कंपनी को प्रतिस्पर्धा के बिना मौका मिला। इसलिए अंतिम निष्कर्ष से पहले संबंधित दस्तावेज, खरीद नियम और अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।
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