बघेलखंड की राजनीति में गहराता जातिवाद: विकास बनाम विद्वेष की जंग

रीवा/सतना: मध्य प्रदेश का बघेलखंड अंचल, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत और सफेद बाघों के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक अलग ही कारण से चर्चा के केंद्र में है। पूर्व मंत्री रामखेलावन पटेल और क्षेत्र के कुछ प्रमुख कुर्मी नेताओं के इर्द–गिर्द केंद्रित होती राजनीति ने अब जातिवाद का एक ऐसा रुख अख्तियार कर लिया है, जो सामाजिक समरसता के लिए चिंता का विषय बन गया है।

विद्वेष की राजनीति और सामाजिक दरार

स्थानीय राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पिछड़ा वर्ग की राजनीति के नाम पर ब्राह्मणों और ठाकुरों के प्रति एक नकारात्मक विमर्श तैयार किया जा रहा है। आरोप हैं कि राजनीतिक लाभ के लिए ‘जातीय ध्रुवीकरण‘ का सहारा लिया जा रहा है, जिससे न केवल समाज दो धड़ों में बंट रहा है, बल्कि पारंपरिक मेल–जोल की भावना भी खत्म हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब नेतृत्व की सोच संकीर्ण हो जाती है, तो उसका सीधा असर विकास कार्यों और प्रशासनिक न्याय पर पड़ता है। नफरत के इस अंदाज ने बघेलखंड के युवाओं के बीच भी एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है।

जातिवाद का यह ‘घटियापन‘ और भविष्य का संकट

देश और प्रदेश में बढ़ता यह जातीय जहर भविष्य के लिए कई खतरे पैदा कर रहा है:

●     योग्यता की अनदेखी: जब चयन का आधार कर्म नहीं बल्कि जाति होती है, तो प्रतिभा पीछे छूट जाती है।

●     सामाजिक अस्थिरता: नफरत की राजनीति अंततः हिंसक टकराव और सामाजिक असुरक्षा को जन्म देती है। 

●     लोकतंत्र का ह्रास: नीतियां और मुद्दे गौण हो जाते हैं और पूरा चुनाव ‘जातीय गणना‘ के गणित में उलझकर रह जाता है।

“लोकतंत्र में असहमति स्वीकार्य है, लेकिन किसी विशेष वर्ग या जाति के प्रति नफरत फैलाना उस आधार को ही खोखला कर देता है जिस पर हमारा समाज टिका है।“

क्या है समाधान?

बघेलखंड की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या 21वीं सदी के भारत में भी हम इसी ‘घटिया‘ जातिवाद के साये में जिएंगे? विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए नेताओं को नफरत की राजनीति छोड़कर ‘सर्वजन हिताय‘ के मार्ग पर चलना होगा। यदि समय रहते इस नफरती अंदाज पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियां एक विभाजित और कमजोर समाज का हिस्सा बनकर रह जाएंगी।

  • gaurav singh rajput

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