ध्येय के नाम पर शोषण का ‘मकड़जाल’, क्या रसातल में जा रहे हैं सरस्वती शिशु मंदिर?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जिसे दुनिया का सबसे बड़ा अनुशासित संगठन कहा जाता है, आज अपने ही भीतर उठ रहे असंतोष के स्वर से घिर गया है। कभीत्याग और तपस्याकी मिसाल माने जाने वाले विद्या भारती के सरस्वती उच्चतर माध्यमिक विद्यालय आज केवल ईंटगारे की इमारतें बनकर रह गए हैं। आरोप लग रहे हैं कि संघ के भीतर बैठे कुछमठाधीशोंने संगठन को चापलूसों का अड्डा बना दिया है, जहाँ निस्वार्थ भाव से काम करने वाले शिक्षकों का आर्थिक और मानसिक शोषण एक कड़वी सच्चाई बन चुका है।

कम वेतन, ज्यादा काम: निष्ठा की बलि चढ़ते शिक्षक

सरस्वती शिशु मंदिरों की नींव उन शिक्षकों ने रखी थी जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के सपने देखे थे। लेकिन आज की जमीनी हकीकत भयावह है। अल्प वेतन (Honorarium) के नाम पर शिक्षकों से दिनरात काम कराया जाता है, जबकि प्रबंधन के पदों पर बैठे लोग कथित तौर पर संसाधनों का बंदरबांट कर रहे हैं।

हमने अपना पूरा जीवन संघ के लिए खपा दिया, इस उम्मीद में कि हम देश की अगली पीढ़ी गढ़ रहे हैं। लेकिन आज हमें अहसास हो रहा है कि हम सिर्फ एकउपयोग की वस्तु‘ (Commodity) बनकर रह गए हैं।” — एक पीड़ित शिक्षक

ब्राह्मण समाज काइस्तेमालऔर चापलूसी का बोलबाला

रिपोर्ट की सबसे तीखी परत वह है जिसमें ब्राह्मण समाज के बौद्धिक वर्ग के शोषण का मुद्दा उठाया गया है। आरोप है कि ब्राह्मण वर्ग अपनी नैसर्गिक निष्ठा और विश्वास के कारण संघ के लिए समर्पित होकर कार्य करता है, लेकिन ऊंचे पदों पर केवल उन्हींचुनिंदाचेहरों को जगह मिलती है जो चापलूसी की कला में माहिर हैं। सच्चा स्वयंसेवक आज भी हाशिए पर है, जबकि मतलबपरस्त लोगमकड़ी के जालकी तरह अपना रसूख फैलाकर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं।

प्रमुख बिंदु: आखिर कहाँ चूक हो रही है?

भव्य इमारतें बनाम खोखली व्यवस्था: विद्यालयों की बिल्डिंगें तो भव्य हो गईं, लेकिन उनमें पढ़ाने वाले गुरुओं की स्थिति दयनीय है।

मर्यदा का हनन: पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान देने के बजाय उन्हें दरकिनार किया जा रहा है।

भ्रष्टाचार की दीमक: चंदे और स्कूल की आय का एक बड़ा हिस्सा जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के बजायऊपरी तंत्रमें ही सिमट कर रह गया है।

आत्ममंथन की जरूरत

यदि संघ अपनी विचारधारा और शिक्षकों के सम्मान की रक्षा नहीं कर पाया, तो वह दिन दूर नहीं जब ये विद्यालय केवल इतिहास के पन्नों में रह जाएंगे। क्या यह सच मेंमतलबी लोगों का जालबन चुका है? यह सवाल आज हर उस स्वयंसेवक के मन में है जिसने संगठन को अपना परिवार माना था।

  • Gaurav Singh

    Gaurav Singh

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