
भोपाल। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा तंत्र में शुचिता, पारदर्शिता और ‘जीरो टॉलरेंस’ के सरकारी दावों की कलई एक बार फिर खुल गई है। मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय (भोपाल) में सरकारी धन की खुली लूट और टेंडर कमीशनखोरी का ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे को हिलाकर रख दिया है। विश्वविद्यालय के वेंडर फर्म ‘के.वी. प्रिंटर्स’ (मेरठ) के व्यवस्थापक श्री राजीव शर्मा द्वारा साक्ष्यों सहित की गई शिकायत के बाद लोकायुक्त कार्यालय, म.प्र. ने तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. सुशील मंडेरिया के विरुद्ध प्रकरण क्रमांक 311/ई/2026-27 दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

35 लाख की नकदी और बैंक तक साये की तरह पीछ खौफनाक उगाही
शिकायतकर्ता राजीव शर्मा के अनुसार, प्रश्नपत्र मुद्रण के कार्य के एवज में पूर्व रजिस्ट्रार ने सीधे तौर पर 40% कमीशन की अवैध मांग रखी थी। पीड़ित का आरोप है कि भुगतान के बदले उन पर दबाव बनाया गया। 2 अप्रैल 2026 को बिल पास कराने के बहाने फाइनेंस शाखा से जुड़े कर्मचारी विशाल असाटी को उनके साथ भेजा गया। बैंक ऑफ बड़ौदा से आरटीजीएस ट्रांसफर कराने के तुरंत बाद यस बैंक एमपी नगर, भोपाल की मुख्य शाखा से 35 लाख रुपये नकद आहरित कराए गए। आरोप है कि विशाल असाटी नामक कर्मचारी तब तक साये की तरह पीड़ित के आगे-पीछे लगा रहा, जब तक कि कमीशन की भारी-भरकम राशि 32.60 लाख से अधिक लैपटॉप बैग में लेकर अधिकारियों तक नहीं पहुंचा दी गई। यस बैंक के सीसीटीवी कैमरे, मोबाइल टावर लोकेशन और व्हाट्सएप संदेश इस सुनियोजित वसूली की चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं।


कमीशन का सिंडिकेट, कुलपति मिलिंद दांडेकर की चुप्पी और ‘कमाओ-खाओ‘ संस्कृति
इस पूरे घटनाक्रम में भोज मुक्त विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर कुलपति मिलिंद दांडेकर महोदय की भूमिका भी गंभीर सवालों के घेरे में है। सवाल उठता है कि जब विश्वविद्यालय परिसर और रजिस्ट्रार आवास से करोड़ों की उगाही का खुला खेल खेला जा रहा था, तब कुलपति मिलिंद दांडेकर क्या कर रहे थे? इतने बड़े मामले के बाद क्यू कोई कार्यवाही नहीं की? क्या यह पूरी कार्यप्रणाली ‘कमाओ, खाओ और आंखें मूंद लो’ के सिद्धांत पर संचालित हो रही थी? छात्रों के भविष्य और जनता के खून-पसीने के टैक्स के पैसे से चलने वाले संस्थान में शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय टेंडर सिंडिकेट और महंगी गाड़ियों की खरीद को प्राथमिकता दी गई। इससे पहले भी ‘प्रेस्टीज टेक्नोलॉजी’ जैसी फर्मों द्वारा विवादों के चलते काम छोड़ना इस बात का प्रमाण है कि यह कोई इकलौती घटना नहीं, बल्कि एक संगठित वसूली तंत्र है।
गंभीर आरोपों के बाद भी मंडेरिया पर मेहरबानी क्यों?
लोकायुक्त में संगीन धाराओं में मामला दर्ज होने के बावजूद डॉ. सुशील मंडेरिया पर प्रशासनिक कार्रवाई न होना सबसे बड़ा रहस्य है। रजिस्ट्रार पद से हटने के बाद भी उन्हें कॉलेज और सिया कि उच्च स्तरीय समितियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर बैठाए रखना क्या यह साबित नहीं करता कि तंत्र भ्रष्टाचारियों को दंड देने के बजाय संरक्षण दे रहा है? क्या बड़े रसूखदारों और राजनेताओं के नाम की धौंस दिखाकर यह सिंडिकेट कानून से ऊपर हो चुका है? मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री जी के करीब होने की धमकी देता रहा है यह रजिस्ट्रार क्या जीरो टॉलरेंस महज़ एक दिखावा है
जनता के सवाल, कब जागेगा राजभवन और शासन?
मध्य प्रदेश शासन की भ्रष्टाचार-विरोधी नीतियां क्या केवल भाषणों तक सीमित हैं? क्या महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजेंगे? ब्रांडवाणी समाचार यह स्पष्ट मांग करता है कि विश्वविद्यालय के सभी टेंडरों की विशेष फॉरेंसिक ऑडिट हो, उगाही सिंडिकेट की बेनामी संपत्तियों की जांच हो और पीड़ित व्यापारी को न्याय मिले।






