
14 अगस्त 1917 का दिन प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास में खास महत्व रखता है। इसी दिन चीन ने अपनी तटस्थता खत्म करते हुए जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी। पहली नजर में यह फैसला यूरोप में चल रहे युद्ध से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे चीन का अपना राजनीतिक और क्षेत्रीय हित था। चीन की नजर खास तौर पर शान्तुंग प्रायद्वीप पर थी, जिस पर उस समय जर्मनी का प्रभाव था। चीन को उम्मीद थी कि युद्ध में शामिल होकर वह युद्ध खत्म होने के बाद अपनी खोई हुई जमीन और अधिकार वापस हासिल कर सकेगा।
जापान पहले ही जर्मनी के खिलाफ उतर चुका था
प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद एशिया में जापान ने भी तेजी से अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू कर दी थी। जापान उस समय ब्रिटेन का सहयोगी था और उसने 23 अगस्त 1914 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।
इसके बाद जापान की नजर चीन के शान्तुंग प्रायद्वीप में मौजूद जर्मनी के महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे त्सिंगताओ पर थी। जापानी सैनिकों ने ब्रिटिश सैनिकों की मदद से यहां अभियान चलाया और नवंबर 1914 में जर्मन गैरीसन के आत्मसमर्पण के बाद इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
यहीं से चीन और जापान के बीच तनाव और गहरा गया। चीन को डर था कि जर्मनी से छीना गया क्षेत्र जापान के स्थायी प्रभाव में चला जाएगा।
जापान की 21 मांगों ने बढ़ाई चीन की चिंता
1915 में जापान ने चीन के सामने 21 मांगें रखीं। इनमें शान्तुंग के साथ साथ दक्षिणी मंचूरिया और पूर्वी भीतरी मंगोलिया में जापान के प्रभाव को बढ़ाने से जुड़ी मांगें शामिल थीं।
चीन के लिए यह बेहद संवेदनशील मामला था। उसे लग रहा था कि प्रथम विश्व युद्ध के बहाने जापान चीन के उन इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जिन पर चीन अपना अधिकार मानता था।
ऐसे माहौल में चीन ने 14 अगस्त 1917 को जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। चीन का मकसद केवल युद्ध में शामिल होना नहीं था, बल्कि उसे उम्मीद थी कि युद्ध समाप्त होने के बाद होने वाली शांति वार्ताओं में उसे अपनी जमीन और अधिकारों के लिए मजबूत स्थिति मिलेगी।
चीन को शान्तुंग वापस मिलने की थी उम्मीद
चीन की सबसे बड़ी उम्मीद शान्तुंग को लेकर थी। उसका मानना था कि अगर वह मित्र राष्ट्रों के साथ खड़ा होता है तो युद्ध के बाद शान्तुंग पर जर्मनी के अधिकार खत्म होने के साथ यह क्षेत्र चीन को वापस मिल सकता है।
लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं थी। युद्ध खत्म होने के बाद 1919 में वर्साय शांति सम्मेलन हुआ। यहां चीन और जापान दोनों ने शान्तुंग पर अपना अपना दावा पेश किया।
मामला मित्र राष्ट्रों की सर्वोच्च परिषद तक पहुंचा, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसी प्रमुख शक्तियां प्रभावशाली भूमिका निभा रही थीं। आखिरकार फैसला जापान के पक्ष में गया। जापान को शान्तुंग में जर्मनी की कई आर्थिक संपत्तियों पर नियंत्रण मिल गया, जिनमें रेलवे, खदानें और त्सिंगताओ बंदरगाह भी शामिल थे।
वर्साय संधि के फैसले से चीन में फूटा गुस्सा
चीन में इस फैसले को बेहद अपमानजनक माना गया। लोगों को उम्मीद थी कि प्रथम विश्व युद्ध में सहयोग करने के बाद चीन के साथ न्याय होगा, लेकिन शान्तुंग को लेकर हुआ फैसला इसके बिल्कुल उलट था।
चीन के प्रतिनिधियों ने वर्साय संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इसके बाद 4 मई 1919 को चीन में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इन्हें आगे चलकर मई चौथा आंदोलन, May Fourth Movement के नाम से जाना गया।
इस आंदोलन ने चीन में राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। युवाओं और छात्रों में विदेशी शक्तियों के खिलाफ असंतोष तेजी से बढ़ा और चीन की राजनीति में बड़े बदलावों की जमीन तैयार हुई।
शान्तुंग पर जापान का नियंत्रण ज्यादा दिन नहीं रहा
दिलचस्प बात यह है कि जापान ने बाद में शान्तुंग का नियंत्रण चीन को लौटाने का वादा किया था और फरवरी 1922 में उसने इसे चीन को वापस कर दिया। लेकिन वर्साय सम्मेलन में जापान के पक्ष में हुए फैसले ने चीन की राजनीति पर गहरा असर छोड़ दिया।
प्रथम विश्व युद्ध में चीन का जर्मनी के खिलाफ उतरना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह केवल एक युद्ध घोषणा नहीं थी। इसके पीछे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता, जापान के बढ़ते प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश छिपी थी।
आने वाले वर्षों में इसी दौर के राष्ट्रवादी आंदोलनों और राजनीतिक उथल पुथल ने चीन के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। 1919 के मई चौथा आंदोलन के बाद पैदा हुआ राजनीतिक माहौल आगे चलकर चीन में नए राजनीतिक संगठनों और विचारधाराओं के उभार की जमीन बना।
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