डबरा नगर पालिका में अवैध कब्जे, CMO के रवैये पर उठे सवाल

डबरा| से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्वालियर जिले की डबरा नगर पालिका में सरकारी आवासों पर अवैध कब्जे और अधिकारियों के रवैये को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह मामला सिर्फ आवास आवंटन तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है।

सरकारी आवासों पर कब्जा, कर्मचारी परेशान

डबरा नगर पालिका क्षेत्र में कई सरकारी आवास ऐसे हैं, जिन पर रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद भी लोग कब्जा जमाए हुए हैं। नियमों के अनुसार, निर्धारित समय के भीतर आवास खाली करना अनिवार्य होता है, लेकिन यहां यह नियम लागू होता नजर नहीं आ रहा। नई पोस्टिंग पर आने वाले कर्मचारियों को आवास नहीं मिल पा रहा है। उन्हें मजबूर होकर निजी मकानों में किराए पर रहना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।

सवाल पूछने पर जवाब नहीं, दिखा अहंकार

जब इस मुद्दे पर मीडिया ने सवाल उठाए, तो जवाब देने के बजाय नगर पालिका की सीएमओ का रवैया चर्चा में आ गया। सीएमओ ने स्पष्ट कहा “मुझे इस विषय पर कुछ नहीं बोलना, मेरी मर्जी यही छाप देना।” लोकतंत्र में मीडिया का काम सवाल पूछना होता है, लेकिन जब अधिकारी जवाब देने से बचते हैं, तो यह पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सिस्टम पर उठे बड़े सवाल

यह मामला अब केवल डबरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि रसूख और सांठगांठ के चलते नियमों की अनदेखी की जा रही है। अगर समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है और अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के मामले सामने आ सकते हैं।

क्या होगी आगे कार्रवाई?

अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है। क्या अवैध कब्जों को हटाया जाएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में त्वरित और सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोका जा सके।
डबरा नगर पालिका का यह मामला सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि सिस्टम में जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा है।

ब्यूरो रिपोर्ट:भरत रावत 

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