लोकायुक्त की अभियोजन मंजूरी अटकी, पूर्व महापौर और अफसरों पर कार्रवाई पर बना सस्पेंस

प्रदेश में एक बार फिर लोकायुक्त की कार्रवाई और अभियोजन स्वीकृति का मामला चर्चा में आ गया है। जानकारी के अनुसार, विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त संगठन, ग्वालियर ने नगर निगम से जुड़े एक मामले में तत्कालीन महापौर, परिषद से जुड़े जनप्रतिनिधियों और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव शासन को भेजा था। आरोप यह था कि नगर निगम की स्वच्छता निधि का उपयोग निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के विपरीत किया गया तथा परिषद की मंजूरी के बिना वित्तीय सहायता वितरित की गई। इस मामले ने उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में काफी सुर्खियां बटोरी थीं।

लोकायुक्त की जांच में कथित रूप से यह माना गया था कि मामले में वित्तीय अनियमितता और पद के दुरुपयोग के तत्व मौजूद हैं। इसी आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत अभियोजन चलाने की अनुमति मांगी गई थी। लोकायुक्त संगठन का मानना था कि यदि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए आगे की कार्रवाई की जाए तो मामले के तथ्यों और जिम्मेदारियों की स्पष्ट जांच संभव हो सकेगी। यही कारण था कि अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव शासन के पास भेजा गया था।

हालांकि अब इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार, शासन स्तर पर की गई कानूनी और प्रशासनिक समीक्षा के दौरान मामले के विभिन्न पहलुओं का पुनः परीक्षण किया गया। बताया जा रहा है कि समीक्षा में कुछ ऐसे बिंदु सामने आए जिनके चलते तत्काल निर्णय लेने के बजाय पूरे प्रकरण का विस्तृत परीक्षण आवश्यक समझा गया। यही वजह है कि लंबे समय से लंबित यह मामला एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है और सभी की नजर शासन के अगले कदम पर टिकी हुई है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं चल रही हैं। एक पक्ष इसे कानून सम्मत प्रक्रिया और निष्पक्ष समीक्षा का हिस्सा मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सवाल उठा रहा है कि इतने समय बाद भी मामले में अंतिम निर्णय क्यों नहीं हो पाया। फिलहाल शासन की ओर से कोई अंतिम आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस मामले पर लिया गया फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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