
न पैसा, न कौड़ी, हाथी क्यों पालें? मध्यप्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियों पर फिरा पानी
मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक कहावत बड़ी मशहूर हो रही है— “न पैसा, न कौड़ी, हाथी क्यों पालें?” यह तंज उन राजनीतिक नियुक्तियों पर है जिसका इंतजार प्रदेश के दिग्गज नेता पिछले 2 साल से कर रहे हैं। निगम और मंडलों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों पर काबिज होने का सपना देख रहे कार्यकर्ताओं और नेताओं की उम्मीदों पर फिलहाल आर्थिक तंगी का साया मंडराता दिख रहा है।
जानकारों की मानें तो प्रदेश सरकार इस समय भारी आर्थिक कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। विकास योजनाओं की निरंतरता बनाए रखने और चुनावी वादों को पूरा करने के लिए सरकार को हर महीने हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में, यदि सरकार निगम-मंडलों में बड़ी संख्या में राजनीतिक नियुक्तियां करती है, तो सरकारी खजाने पर वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं का बोझ और अधिक बढ़ जाएगा।
करीब 2 साल का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन “आज-कल” के वादों के बीच अभी तक नियुक्तियों की सूची जारी नहीं हो पाई है। नेताओं का सब्र अब जवाब दे रहा है, लेकिन सरकार की प्राथमिकता फिलहाल वित्तीय संतुलन बनाए रखना है। इन पदों पर होने वाली नियुक्तियां ‘सफेद हाथी’ पालने के समान मानी जा रही हैं, क्योंकि इनके लिए आवश्यक बजट का प्रबंध करना वर्तमान परिस्थितियों में एक बड़ी चुनौती है।
प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि जब तक सरकार की वित्तीय स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक इन मलाईदार पदों पर नियुक्तियों की संभावना कम ही है। मुख्यमंत्री और कैबिनेट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस आर्थिक संकट के बीच राजनीतिक संतुष्टि के लिए खजाने पर अतिरिक्त भार डालना सही होगा? फिलहाल, नेताओं का इंतजार खत्म होता नहीं दिख रहा है।
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