
भोपाल। मध्य प्रदेश की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र को लेकर चल रहा विवाद अब राजनीतिक रूप से और गहरा गया है। मामले की सुनवाई से पहले विभागीय स्तर पर मुनादी कराने के आदेश को लेकर सरकार के भीतर ही असंतोष सामने आया है। कैबिनेट बैठक के बाद प्रदेश के छह मंत्रियों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
मंत्रियों ने उठाए कार्रवाई पर सवाल
मुख्यमंत्री से मिलने वालों में उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के अलावा मंत्री विजय शाह, दिलीप जायसवाल, गौतम टेटवाल, लखन पटेल और दिलीप अहिरवार शामिल रहे। मंत्रियों का कहना है कि सुनवाई पूरी होने से पहले मुनादी कराने का आदेश राज्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला कदम है। उन्होंने मामले में संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
समिति के सामने दोनों पक्षों ने रखे तर्क
अनुसूचित जाति मामलों की राज्य स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता एवं कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दावा किया कि बागरी समुदाय पुराने गजट में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था और प्रतिमा बागरी मूल रूप से राजपूत समाज से हैं।
वहीं, प्रतिमा बागरी ने अपने पक्ष में करीब 110 वर्ष पुराने खसरा-खतौनी, न्यायालय के दस्तावेज और अन्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड समिति के समक्ष प्रस्तुत किए। उनका कहना है कि किसी भी सरकारी दस्तावेज में बागरी समाज को राजपूत नहीं बताया गया है।
पुराने नेताओं के उदाहरण भी दिए
प्रतिमा बागरी ने जुगल किशोर बागरी, काशी बागरी, शिवदयाल बागरी और महेंद्र बागरी जैसे नेताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि वे भी इसी समाज से थे और अनुसूचित जाति वर्ग की आरक्षित सीटों से चुनाव जीतकर विधायक बने। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ही नहीं, कांग्रेस ने भी वर्षों तक बागरी समाज के नेताओं को अनुसूचित जाति वर्ग से टिकट दिया है।
दो सप्ताह में आ सकता है फैसला
फिलहाल दोनों पक्षों के दस्तावेज और दलीलें समिति के पास हैं। सूत्रों के अनुसार सभी रिकॉर्ड की जांच के बाद अगले दो सप्ताह के भीतर समिति अपना अंतिम निर्णय सुना सकती है। इस फैसले पर न केवल प्रतिमा बागरी के राजनीतिक भविष्य, बल्कि प्रदेश की राजनीति की दिशा पर भी नजर रहेगी।
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