
नई दिल्ली: देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों- कांग्रेस और बीजेपी के पुराने सरकारी दफ्तरों को लेकर एक सूचना के अधिकार के तहत चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। दिल्ली के वीवीआईपी इलाके 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस के पुराने राष्ट्रीय मुख्यालय को लेकर सामने आया है कि साल 2013 में आवंटन रद्द होने के बावजूद न तो यह बंगला खाली किया गया और न ही पिछले 13 वर्षों से इसका किराया चुकाया गया है। हालांकि, इस मामले पर केंद्र सरकार का रुख है कि बकाया राशि का अंतिम आकलन अभी समीक्षा के अधीन है।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन आने वाले डायरेक्टरेट ऑफ एस्टेट्स ने एक आरटीआई का जवाब दिया। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 24 अकबर रोड स्थित यह बंगला कांग्रेस पार्टी को 7 अगस्त 1992 को आवंटित हुआ था, जिसे बाद में 26 जून 2013 को रद्द कर दिया गया। इसके बाद भी पार्टी ने परिसर को खाली नहीं किया। हालांकि कांग्रेस अपना नया दफ्तर कोटला रोड स्थित इंदिरा गांधी भवन में स्थानांतरित कर चुकी है। आरटीआई के मुताबिक, साल 2013 से इस बंगले का कोई किराया नहीं दिया गया है, लेकिन सरकार ने अभी तक कुल बकाया राशि का निर्धारण नहीं किया है, जिसके चलते वसूली की कानूनी प्रक्रिया भी अटकी हुई है।
जब विभाग से यह पूछा गया कि क्या बंगला खाली कराने के लिए कोई नोटिस दिया गया था, तो विभाग ने आरटीआई अधिनियम की धारा 7(9) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि इसके लिए अत्यधिक सरकारी संसाधनों की आवश्यकता होगी क्योंकि ये रिकॉर्ड अलग-अलग जगहों पर हैं। इसी आरटीआई में सत्ताधारी दल बीजेपी के पुराने कार्यालय 11 अशोक रोड का भी लेखा-जोखा सामने आया है। बीजेपी ने दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर अपना भव्य नया मुख्यालय बना लिया है, लेकिन उनका पुराना दफ्तर भी अभी उपयोग में है। डायरेक्टरेट के अनुसार, 21 मार्च 1985 को बीजेपी को आवंटित हुआ यह बंगला अब लोकसभा सदस्यों के पूल का हिस्सा बन चुका है।
इस दफ्तर पर बीजेपी का कोई बकाया है या नहीं, इस पर भी अभी सरकारी समीक्षा चल रही है और किराए से जुड़े आंकड़े लोकसभा सचिवालय के पास सुरक्षित हैं। इससे पहले 2018 और 2019 की आरटीआई में भी यह बात सामने आई थी कि साल 2017 से इस बंगले की लाइसेंस फीस 3,920 रुपये प्रतिमाह तय थी और बीजेपी ने इसे सामान्य फीस पर रखने की अपील की थी। कुल मिलाकर, आरटीआई के इन नए तथ्यों ने दोनों ही प्रमुख दलों को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जहां नए ठिकाने मिलने के बाद भी पुराने सरकारी बंगलों का मोह नहीं छूट रहा है।
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