
रिपोर्टर: विशेष संवाददाता, ब्रांडवाणी समाचार
स्थान: भोपाल, मध्य प्रदेश
जब रक्षक ही बताने लगें सेंधमारी के तरीके मध्य प्रदेश की सियासत और नौकरशाही में इन दिनों एक ऐसा भूचाल आया हुआ है,जिसकी गूंज भोपाल के वल्लभ भवन से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक सुनाई दे रही है। सूबे में भ्रष्टाचार को लेकर लगातार उठ रहे गंभीर सवालों के बीच नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। इस वायरल वीडियो ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे की उस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिसे सत्ताधारी दल अक्सर सुशासन के मोटे पर्दों के पीछे छिपाने का प्रयास करते हैं। वीडियो में कथित तौर पर राज्य के एक बेहद जिम्मेदार और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ही यह बताया जा रहा है कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार आखिर कैसे होता है।
इस खुलासे के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब विपक्ष लगातार भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाता है, जब सड़क से लेकर विधानसभा तक कमीशनखोरी की गूंज होती है, और जब खुद सरकार के शीर्ष अधिकारियों को व्यवस्था में फैले इस दीमक की पूरी जानकारी है, तो फिर भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं होती? आखिर जवाबदेही किसकी तय की जाएगी? क्या भ्रष्टाचार केवल एक राजनीतिक आरोप बनकर रह गया है, या फिर यह पूरी व्यवस्था की रगों में दौड़ने वाला वह जहर बन चुका है जिसका कोई एंटीडोट सरकार के पास नहीं है?
वायरल वीडियो का सच और संजय दुबे का बेबाक अंदाज
आईएएस अधिकारी संजय दुबे मध्य प्रदेश कैडर के उन गिने-चुने अधिकारियों में शुमार किए जाते हैं, जिनकी कार्यशैली हमेशा चर्चा का विषय रही है। वर्तमान में वे नगरीय प्रशासन विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे के अपर मुख्य सचिव हैं। नगरीय प्रशासन विभाग वह विभाग है जिसका सीधा जुड़ाव जनता की रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाओं से होता है—सड़क,नाली, पानी, सीवेज, और नगर निगमों के बड़े-बड़े टेंडर इसी विभाग के अंतर्गत आते हैं। और विडंबना देखिए कि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप भी अमूमन इसी विभाग पर लगते रहे हैं।
वायरल वीडियो में संजय दुबे जिस बेबाकी से भ्रष्टाचार के तौर-तरीकों का विश्लेषण कर रहे हैं, उसने पूरे सरकारी तंत्र को आईना दिखा दिया है। संजय दुबे ने सच बोला है, और उनका यह सच कोई सामान्य बात नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम के भीतर बैठे ईमानदार और कर्मठ अधिकारी भी इस भ्रष्ट कार्यप्रणाली से किस कदर वाकिफ और संभवतः त्रस्त हैं। वीडियो में स्पष्ट होता दिख रहा है कि फाइलों के पास होने से लेकर ठेकेदारों के भुगतान तक, किस स्तर पर क्या खेल होता है, यह बात शीर्ष अधिकारियों से छिपी नहीं है। लेकिन यह जानकारी होने के बावजूद व्यवस्था का ज्यों का त्यों बने रहना, कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति, कथनी और करनी का अंतर?

मध्य प्रदेश की कमान जब डॉ. मोहन यादव के हाथों में सौंपी गई थी, तो उन्होंने प्रदेश की जनता से सुशासन का वादा किया था। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही डॉ. मोहन यादव लगातार मंचों से यह उद्घोष करते रहे हैं कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की नीति लागू है। उन्होंने कई बार भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को चेतावनी दी है कि जनता के पैसे की लूट बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लेकिन आईएएस संजय दुबे के इस वीडियो ने मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की जमीनी हकीकत की पोल खोलकर रख दी है। अगर वास्तव में जीरो टॉलरेंस की नीति धरातल पर काम कर रही होती, तो नगरीय प्रशासन जैसे बड़े विभाग के एसीएस को इस तरह से सिस्टम की लाचारी या भ्रष्टाचार की कार्यप्रणाली को सार्वजनिक रूप से या किसी बैठक में इस तरह बयां करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? यह वीडियो इस बात का चीख-चीख कर गवाह दे रहा है कि शीर्ष स्तर पर भले ही ईमानदार नीतियां बनाने के दावे किए जा रहे हों, लेकिन निचले और मध्य स्तर के सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का दीमक आज भी उसी तेजी से विकास की नींव को खोखला कर रहा है। मुख्यमंत्री जी की नीतियां फाइलों और भाषणों में तो बहुत प्रभावशाली दिखती हैं, लेकिन असलियत में वे कहीं भी कारगर साबित होती नहीं दिख रही हैं।
संजय दुबे, एक ऐसा अधिकारी जिसमें दिखता है भावी मुख्य सचिव
संजय दुबे की छवि प्रदेश में एक बेहद सख्त, निर्णय लेने में तेज और दूरदर्शी आईएएस अधिकारी की रही है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि संजय दुबे के भीतर प्रदेश के मुख्य सचिव बनने की पूरी क्षमता और छवि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनके पास वह प्रशासनिक दक्षता और अनुभव है, जिसके बल पर वे मध्य प्रदेश का कायाकल्प कर सकते हैं। शिक्षा विभाग हो, ऊर्जा विभाग हो या अब नगरीय प्रशासन, जहां भी संजय दुबे रहे हैं, उन्होंने अपनी एक अलग छाप छोड़ी है।
एक ऐसा अधिकारी जो व्यवस्था को सुधारने का माद्दा रखता हो, जब वह खु भ्रष्टाचार के मकड़जाल की बात करे, तो इसे केवल एक वीडियो मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह एक ‘अलार्मिंग बेल’ (चेतावनी की घंटी) है। संजय दुबे जैसे अधिकारी, जो सिस्टम की सर्जरी करने की हिम्मत रखते हैं, उनकी बातों का मुख्यमंत्री पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। क्या डॉ. मोहन यादव अपने इस होनहार अधिकारी की बातों को गंभीरता से लेते हुए पूरे नगरीय प्रशासन विभाग में एक बड़ा ‘ऑपरेशन क्लीन’ चलाएंगे? या फिर यह वीडियो भी राजनीतिक बयानबाजी की भेंट चढ़ जाएगा?
विपक्ष के सवाल और सत्ता पक्ष की चुप्पी इस वीडियो के सामने आने के बाद विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि मध्य प्रदेश में बिना ‘कमीशन’ के कोई काम नहीं होता। अब विपक्ष पूछ रहा है कि जब सरकार के अपने इतने वरिष्ठ अधिकारी खुद भ्रष्टाचार के तरीके बता रहे हैं, तो फिर जांच एजेंसियां (EOW, लोकायुक्त) क्या कर रही हैं?
विपक्ष का यह सवाल पूरी तरह से जायज है कि जब बीमारी का पता है, बीमारी के लक्षणों का पता है और यह भी पता है कि बीमारी कैसे फैल रही है, तो फिर इलाज क्यों नहीं किया जा रहा? सत्ता पक्ष इस पूरे मामले पर फिलहाल असहज नजर आ रहा है। बचाव में दिए जाने वाले तर्क जनता के गले नहीं उतर रहे हैं क्योंकि वीडियो में बोलने वाला व्यक्ति कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सरकार का अपना एक शीर्ष नौकरशाह है।
आखिर जवाबदेही किसकी है? लोकतंत्र में जब भी सिस्टम फेल होता है, तो सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का ही होता है। ब्रांडवाणी समाचार यह कड़ा सवाल पूछता है कि इस अनियंत्रित भ्रष्टाचार के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?
- क्या वे राजनेता जिम्मेदार हैं जो चुनाव जीतने के लिए अथाह पैसा खर्च करते हैं और फिर उसकी वसूली के लिए सिस्टम पर दबाव बनाते हैं?
- क्या वे अधिकारी जिम्मेदार हैं जो अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए नियमों को ताक पर रख देते हैं?
- या फिर वह आम जनता भी कुछ हद तक जिम्मेदार है जिसने भ्रष्टाचार को अपने जीवन का एक सामान्य हिस्सा मानकर उसके खिलाफ आवाज उठाना बंद कर दिया है?
नगरीय प्रशासन विभाग में सड़कों के निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल, टेंडर प्रक्रिया में चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाना, और नगर निगमों में भवन अनुज्ञा से लेकर सफाई ठेकों तक में होने वाला खेल कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब संजय दुबे जैसे अधिकारी इन बातों की तरफ इशारा करते हैं, तो इसका अर्थ है कि पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा है।
क्या बदलेगी मध्य प्रदेश की तस्वीर? ब्रांडवाणी समाचार के इस विश्लेषण का लब्बोलुआब यह है कि मध्य प्रदेश इस समय एक प्रशासनिक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाने की महत्वाकांक्षा है, तो दूसरी तरफ दशकों से जड़ों में समाया हुआ वह भ्रष्ट तंत्र है, जिसे तोड़ना किसी भी सरकार के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।
संजय दुबे के वायरल वीडियो को एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि एक विवाद के रूप में। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को चाहिए कि वे संजय दुबे जैसे अधिकारियों को ढाल बनाएं और उनके अनुभव का उपयोग करते हुए सिस्टम की उन खामियों को दूर करें, जहां से भ्रष्टाचार का लीकेज हो रहा है। यदि मध्य प्रदेश का वास्तव में कायाकल्प करना है, तो ‘जीरो टॉलरेंस’ को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय, उसे जमीन पर निर्दयता के साथ लागू करना होगा।
जनता सवाल पूछ रही है, विपक्ष हमलावर है, और अधिकारी हकीकत बयान कर रहे हैं। अब गेंद पूरी तरह से मध्य प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव के पाले में है। यह देखना बाकी है कि वे इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं और संजय दुबे जैसे कर्मठ अधिकारियों की बातों का उन पर क्या और कितना प्रभाव पड़ता है। क्या मध्य प्रदेश सच में भ्रष्टाचार मुक्त हो पाएगा, या यह वीडियो भी वक्त की धूल में गुम हो जाएगा?समय ही इसका सबसे सटीक जवाब देगा।








