
लखनऊ/राशिद सिद्दीकी की रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश में बिजली दरों में प्रस्तावित 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। बढ़ती महंगाई के बीच बिजली की कीमतों में इजाफे के प्रस्ताव पर विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और उपभोक्ता संगठनों ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया है।
राज्य में पहले से ही रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से लोग परेशान हैं। ऐसे में बिजली दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव सामने आने के बाद विपक्ष का कहना है कि इससे आम उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण करने में विफल रही है और अब बिजली के दाम बढ़ाकर लोगों की मुश्किलें और बढ़ाना चाहती है।
दीपक राजन ने कहा कि सरकार लगातार आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले गैस सिलेंडर महंगे हुए, फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं और अब बिजली दरों में वृद्धि की तैयारी की जा रही है। उनका कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ेगा।
वहीं सुरेंद्र राजपूत ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता पहले से ही महंगाई की मार झेल रही है। ऐसे समय में बिजली दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव जनविरोधी कदम साबित होगा। उन्होंने सरकार से इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की मांग की। उधर उपभोक्ता संगठनों ने भी बिजली दरें बढ़ाने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने कहा कि बिजली कंपनियों को पहले अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करना चाहिए। उनका कहना है कि लाइन लॉस, बिजली चोरी और वितरण व्यवस्था की खामियों को दूर किए बिना उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना उचित नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि बिजली कंपनियों के राजस्व प्रबंधन और संचालन व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए। इसके बाद ही किसी प्रकार की दर वृद्धि पर विचार होना चाहिए। बिजली दरों में प्रस्तावित बढ़ोतरी को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर जनसुनवाई और नियामक आयोग की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न पक्षों के तर्क और आपत्तियां सामने आ सकती हैं। फिलहाल विपक्ष इस मुद्दे को जनता से जोड़कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है।
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