
भोपाल | विशेष रिपोर्ट मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही सवाल तैर रहा है निगम-मंडलों में नियुक्तियों का पिटारा कब खुलेगा? लेकिन सवाल सिर्फ ‘कब’ का नहीं है, सवाल ‘कैसे’ का है। क्या डॉ. मोहन यादव की ‘विद्वान’ सरकार में नियुक्तियों का आधार सिर्फ राजनीतिक वफादारी होगी, या इस बार ‘विज़न’ और ‘प्रोजेक्ट प्लान’ को भी तवज्जो मिलेगी?
पुराना मर्ज: कर्ज में डूबा प्रदेश और रेवड़ियों की राजनीति
पिछले 18 सालों में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल को लेकर अक्सर यह आरोप लगते रहे कि प्रदेश ‘कर्ज की बैसाखी’ पर चल रहा है। मलाईदार पदों पर अपनों को बिठाकर जनता के टैक्स का पैसा सफेद हाथियों (निगम-मंडलों) को पालने में खर्च किया गया। अब जनता की अदालत में यह सवाल खड़ा है कि क्या डॉ. मोहन यादव भी उसी ‘चूना लगाने’ वाली परंपरा को आगे बढ़ाएंगे या प्रदेश को कर्ज के दलदल से बाहर निकालने का कोई ठोस ब्लूप्रिंट पेश करेंगे?
नेताओं के पास ‘मास्टर प्लान‘ या सिर्फ ‘सिफारिशी पत्र‘?
आज के दौर में जब हर क्षेत्र प्रोफेशनल हो रहा है, तो राजनीति में वही पुराना ढर्रा क्यों?
- विजन की कमी: क्या नियुक्त होने वाले नेताओं के पास इस बात का जवाब है कि उनके आने से उस विशेष विभाग या निगम में क्या क्रांतिकारी बदलाव आएगा?
- प्रोजेक्ट रिपोर्ट अनिवार्य हो: क्या मुख्यमंत्री ऐसी मिसाल पेश करेंगे जहाँ नियुक्ति से पहले नेता को अपना ‘मास्टर प्लान’ जमा करना पड़े?
- जवाबदेही का अभाव: अब तक निगम-मंडल सिर्फ राजनीतिक पुनर्वास के केंद्र रहे हैं, जहाँ हारने वाले या असंतुष्ट नेताओं को खुश किया जाता रहा है।
शिक्षित मुख्यमंत्री से ‘शिक्षित‘ फैसले की उम्मीद
डॉ. मोहन यादव खुद उच्च शिक्षित हैं, उनके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगा है। ऐसे में प्रदेश की जनता यह उम्मीद कर रही है कि वे ‘पॉलिटिकल एडजस्टमेंट’ के बजाय ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ नियुक्तियां करेंगे।
ब्रैंडवाणी विश्लेषण: क्या मध्य प्रदेश का भविष्य वास्तव में सुरक्षित हाथों में है? अगर इन नियुक्तियों में भी वही पुराने चेहरे और वही पुरानी ‘पर्ची प्रथा’ चली, तो साफ हो जाएगा कि चेहरा बदला है, चरित्र नहीं। कर्ज बढ़ेगा या जनता को राहत मिलेगी, यह डॉ. यादव के ‘विजन’ पर निर्भर करता है।
तल्ख सवाल जो सरकार को चुभेंगे:
- क्या निगम-मंडलों के अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए कोई ‘मेरिट’ तय की जाएगी?
- क्या इन नेताओं के पास इस बात का रोडमैप है कि वे प्रदेश के राजस्व में कैसे बढ़ोतरी करेंगे?
- क्या एमपी फिर से कर्ज लेकर ‘घी पीने’ वाली संस्कृति की ओर बढ़ रहा है?







