
आज हम बात करेंगे उस सरकारी ‘सिस्टम’ की, जो पहले खुद गड्ढा खोदता है और फिर उसमें जनता का पैसा दफन कर देता है। चाहे वो PWD की सड़कें हों, चमचमाते सरकारी भवन हों या नहरों की सफाई हर जगह एक ही बीमारी है: ‘बिलो रेट’ का टेंडर। जब ठेकेदार काम लेने की होड़ में असली लागत से भी नीचे जाकर बोली लगाता है, तो क्या विभाग के अधिकारियों को नहीं पता कि इतने में तो ईंट भी ढंग की नहीं आएगी? फिर काम खराब होने पर सड़क तोड़कर जांच करने का नाटक क्यों?
1. ‘सस्ते’ के चक्कर में ‘घटिया’ का सौदा सरकारी दफ्तरों में एक नियम है जो सबसे कम रेट देगा, काम उसे मिलेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या गुणवत्ता से समझौता करने की छूट भी उसी रेट में शामिल है? जब एक ठेकेदार घाटे में टेंडर लेता है, तो वो अपनी जेब नहीं भरता, बल्कि सीमेंट में रेत और कोलतार में पानी मिलाता है।
2. जांच का ढोंग बंद करो सड़क बनने के दो महीने बाद उसे खोदकर चेक करना कि मसाला कैसा लगा है, यह तो वही बात हुई कि मरीज के मरने के बाद उसका इलाज ढूंढा जा रहा है। अगर जांच करनी ही है, तो उस ‘बिलो रेट’ वाली फाइल की जांच कीजिए। यह पता लगाइए कि ठेकेदार इतने कम पैसे में घर बना रहा है या खंडहर?
3. अधिकारियों की भूमिका: संरक्षक या भक्षक? अधिकारियों का काम सिर्फ फाइल पर दस्तखत करना नहीं है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में रेट कम है, तो अधिकारियों को चाहिए कि वे ‘कमीशन’ की भूख छोड़कर साइट पर खड़े होकर काम करवाएं। ठेकेदार को मजबूर करें कि वह गुणवत्ता बनाए रखे, न कि उसे भ्रष्टाचार की छूट देकर अपना हिस्सा वसूलें।
4. जनता का पैसा, अफसरों की ऐश यह पैसा किसी मंत्री या अधिकारी की पुश्तैनी जायदाद नहीं है, यह आम आदमी का टैक्स है। “कमीशन कम, काम दमदार” यही एकमात्र रास्ता है जिससे हमारे सरकारी भवन और सड़कें पहली बारिश में बहने से बच सकती हैं।
अब समय आ गया है कि हम सड़कों को नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट सोच को तोड़ें जो ‘सस्ते’ के नाम पर ‘सड़ा हुआ’ निर्माण परोस रही है। PWD और अन्य विभाग याद रखें, जनता अब जाग चुकी है और आपकी ‘खोदकर जांच करने’ वाली नौटंकी अब और नहीं चलेगी।







