
ब्यूरो रिपोर्ट, भोपाल दिनांक: 14 मार्च, 2026 “राजधानी भोपाल की सड़कों पर आज गैस सिलेंडर के लिए मची त्राहि-त्राहि सरकार के उन गुलाबी दावों की पोल खोल रही है, जिनमें कहा गया था कि ‘सब चंगा है’। ग्राउंड जीरो पर हकीकत यह है कि भोपाल में 2200 से ज्यादा लोगों की वेटिंग चल रही है और बुकिंग करना किसी जंग जीतने जैसा हो गया है। आखिर जनता कब तक खाली चूल्हों के सामने बैठकर सरकार के ‘आश्वासनों’ की खिचड़ी पकाएगी?”
- सरकारी दावों पर सवाल: एक तरफ सरकार और तेल कंपनियां दावा कर रही हैं कि स्टॉक की कोई कमी नहीं है, तो दूसरी तरफ भोपाल की गैस एजेंसियों के बाहर किलोमीटर लंबी कतारें क्या केवल ‘पिकनिक’ मनाने के लिए लगी हैं? अगर आपूर्ति सामान्य है, तो आम आदमी को अपना हक पाने के लिए दफ्तर से छुट्टी लेकर लाइनों में क्यों लगना पड़ रहा है?
- बुकिंग का ‘भूलभुलैया‘ खेल: ऑनलाइन पोर्टल ठप पड़े हैं, सर्वर का बहाना बनाकर आम जनता को डिजिटल इंडिया के नाम पर ठगा जा रहा है। 21 दिन की बुकिंग सीमा को बढ़ाकर 25 दिन कर देना क्या किल्लत छुपाने का एक सरकारी पैंतरा नहीं है?
- कालाबाजारी का नंगा नाच: जब ईमानदार ग्राहक एजेंसी के चक्कर काट रहा है, तब सिलेंडर 400 से 500 रुपये की ‘अतिरिक्त रिश्वत’ पर ब्लैक में कैसे मिल रहे हैं? क्या प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस खेल में उनकी मौन सहमति है?
- ईरान-इजराइल युद्ध का बहाना: वैश्विक संकट का हवाला देकर अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छुपाना अब पुराना हो चुका है। भोपाल की जनता पूछ रही है अगर युद्ध विदेश में है, तो उसका जुर्माना भोपाल की गृहणियां क्यों भरें?
“आम जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है। अगर जल्द ही सप्लाई बहाल नहीं हुई, तो खाली सिलेंडरों की खनक सड़कों पर सरकार के खिलाफ बड़े विरोध की गूंज बनेगी। सरकार को समझना होगा कि जनता को ‘आंकड़ों’ से नहीं, ‘आंच’ से मतलब है।”







