
भोपाल। मध्यप्रदेश के सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ‘साहब’ के सियासी गणित की खूब चर्चा हो रही है। किस्सा कुछ ऐसा है कि रिटायरमेंट के तुरंत बाद ही साहब अपनी नई पारी की सेटिंग में जुट गए थे। चूंकि साहब उसी शहर के वासी हैं जहां से प्रदेश के मुखिया आते हैं, तो उन्हें पूरा भरोसा था कि उनका अनुभव सरकार के काम जरूर आएगा।
सूत्रों की मानें तो साहब की उम्मीदें फलीभूत भी हो रही थीं। मुख्यमंत्री कार्यालय में उनकी नियुक्ति की फाइल टेबल तक पहुंच चुकी थी, बस आदेश पर मुहर लगने की देरी थी। लेकिन कहते हैं न कि ब्यूरोक्रेसी में ‘हिसाब-किताब’ सबसे पक्का होता है। आखिरी वक्त पर साहब ने अपनी ही नियुक्ति का गुणा-भाग बदल दिया।
साहब ने भांप लिया था कि अगर CMO में नियुक्ति होती है, तो कार्यकाल महज एक साल का रहेगा। इसके बाद हर साल रिन्यूअल के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। इसी माथापच्ची से बचने के लिए साहब ने एक ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला कि हर कोई हैरान रह गया।
साहब ने चतुराई दिखाते हुए अपनी फाइल सीधे एक ‘आयोग’ की तरफ मुड़वा ली। तर्क सीधा था आयोग में कार्यकाल लंबा है, काम का दबाव मुख्यमंत्री कार्यालय की तुलना में काफी कम है और सुविधाएं भी पूरी हैं।
अब सत्ता के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि रिटायरमेंट के बाद भी साहब ने वो ‘ड्रीम पोस्टिंग’ हासिल कर ली है, जिसके लिए लोग अपनी पूरी सर्विस के दौरान तरसते रह जाते हैं। साहब की इस सियासी चाल ने साबित कर दिया कि अनुभव सिर्फ काम में नहीं, बल्कि ‘सही कुर्सी’ चुनने में भी काम आता है।







