
दमोह: स्थानीय श्री ज्ञानचंद्र श्रीवास्तव महाविद्यालय में ‘इको क्लब’ के छात्र-छात्राओं के लिए पर्यावरण शिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वर्मिकंपोस्टिंग (केंचुआ खाद) और मशरूम कल्टीवेशन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जहां विशेषज्ञों ने आधुनिक और प्राकृतिक कृषि के सामंजस्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ‘मेहता ऑर्गेनिक ग्रीन’ से विषय विशेषज्ञ शिवम पाठक एवं प्रथम तिवारी उपस्थित रहे। साथ ही महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. एन.आर. सुमन, डॉ. जी.पी. अहिरवार, डॉ. माधुरी महंत, डॉ. रवीश अहिरवार, डॉ. इंद्रा जैन, डॉ. कीर्तिकांत दुबे, डॉ. उषा सोनी, डॉ. संध्या पिंपलापुरे, डॉ. राहुल दुबे, श्री आसाराम यादव, श्री सौरभ विश्वकर्मा, विनोद साहू एवं मनीष साहू की गरिमामय उपस्थिति रही।
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डॉ. एन.आर. सुमन ने मशरूम फार्मिंग की तकनीक और इसके आर्थिक लाभों पर विशेष व्याख्यान दिया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विशेषज्ञ शिवम पाठक ने मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि 1960 में भारतीय मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन 1% से अधिक था, जो आज रासायनिक खादों के प्रयोग से 0.05% से भी नीचे गिर गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें अपनी प्राचीन कृषि परंपराओं की ओर लौटना होगा।
शिवम पाठक ने कहा कि पुराने समय में गौ-वंश को ‘धन’ के रूप में पूजा जाता था, क्योंकि गाय से प्राप्त दूध और घी मानव स्वास्थ्य को पुष्ट करते थे, वहीं गोबर और गौ-मूत्र मिट्टी की उर्वरकता बनाए रखते थे। उन्होंने आधुनिक तकनीक के साथ पशुपालन को जोड़कर नई शुरुआत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण महाविद्यालय परिसर में स्थापित ‘प्रदर्शनी इकाई’ रही, जहां वर्मिकंपोस्ट तैयार करने की संपूर्ण प्रक्रिया का सजीव प्रदर्शन दिया गया। छात्र-छात्राओं ने जैविक खाद बनाने की बारीकियों को समझा और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।
इस प्रशिक्षण शिविर ने छात्र-छात्राओं को न केवल जैविक खेती की तकनीकों से अवगत कराया, बल्कि उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक होकर स्थायी कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
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