लोकतंत्र का ‘अग्निपथ’: बंगाल का रण और संस्थाओं की साख पर सवाल

 लोकतंत्र के उस दुर्ग की, जहाँ की दीवारों पर आज डर, सत्ता का रसूख और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के सवाल अंकित हैं। पश्चिम बंगाल… एक ऐसा राज्य जो अपनी राजनीतिक चेतना के लिए जाना जाता है, आज वह भारतीय राजनीति की बिसात का सबसे जटिल खाना बन चुका है।

क्या ममता बनर्जी के किले को ढहाने की ‘ज़िद’ ने राजनीति के स्तर को रसातल में धकेल दिया है? क्या चुनाव अब पारदर्शी नहीं रहे? जब सत्ता का पूरा तंत्र—चाहे वो मीडिया हो, जाँच एजेंसियां हों या निर्वाचन आयोग—एक ही दिशा में झुकता हुआ महसूस होने लगे, तो क्या जनता का विश्वास डगमगाने लगता है? आज विश्लेषण करेंगे उस ‘डर की राजनीति’ का, जो भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को झकझोर रही है।

आज आम चर्चा है कि क्या चुनाव आयोग केवल एक रेफरी रह गया है या वह किसी विशेष टीम की जर्सी पहन चुका है। अधिकारियों के तबादले से लेकर रैलियों की अनुमति तक, जब तराजू एक तरफ झुकने लगता है, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। क्या यह ‘पावर पॉलिटिक्स’ का चरम है जहाँ नियम केवल विपक्ष के लिए होते हैं?

चौथे स्तंभ की भूमिका आज सवालों के घेरे में है। जब मीडिया जनसरोकार के बजाय सत्ता के ‘शक्ति प्रदर्शन’ का भोंपू बन जाए, तो जनता तक सच नहीं, बल्कि प्रोपेगेंडा पहुँचता है। ममता बनर्जी के खिलाफ जिस तरह का घेराव मीडिया के माध्यम से तैयार किया गया, वह निष्पक्ष पत्रकारिता पर बड़ा दाग है।

सवाल उठता है कि क्या अब वोट ‘मर्जी’ से नहीं बल्कि ‘डर’ से दिए जाएंगे? जब केंद्रीय एजेंसियों की धमक और स्थानीय रसूख के बीच आम आदमी पिसता है, तो उसका मत उसकी आवाज़ नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी बन जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है, जब-जब जनता को डराने की कोशिश हुई है, उसका मौन विद्रोह और भी भीषण रहा है।

क्या विपक्ष के आंदोलनों में अब वो दम नहीं बचा? या फिर सत्ता की ताकत इतनी असीमित हो गई है कि सड़कों पर उठने वाली आवाज़ों को दफ्तरों की फाइलों में दबा दिया जाता है? सरकार चलाने के लिए अब जनमत से ज्यादा ‘मैनेजमेंट’ की जरूरत पड़ने लगी है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

राजनीति में हार और जीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन जब ‘जीतने की जिद’ सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कुचलने लगे, तो हार पूरे देश की होती है। बंगाल का संग्राम सिर्फ एक सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा है कि क्या हमारा संविधान उन लोगों को सुरक्षित रख पाएगा जो सत्ता के सामने झुकने से इनकार करते हैं।

डर से सरकारें तो चल सकती हैं, लेकिन राष्ट्र नहीं। राष्ट्र चलता है विश्वास से, पारदर्शिता से और जनता की बेखौफ भागीदारी से। अब समय है कि हम खुद से पूछें—क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र में रहना चाहते हैं जहाँ चुनाव केवल एक औपचारिकता हों?

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