
प्रदेश के एक बड़े जिले में इन दिनों प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती खींचतान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जा रहा है कि सत्ताधारी दल के कई विधायक आपसी मतभेदों के बावजूद एक मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं, और वह मुद्दा है जिले के कलेक्टर का कार्यशैली को लेकर बढ़ता असंतोष। सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से जनप्रतिनिधियों के बीच यह चर्चा चल रही थी कि जिले के कई विकास कार्य और स्थानीय समस्याएं प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से नहीं ली जा रहीं। अब यह नाराजगी खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है।
जानकारी के मुताबिक, हाल ही में कुछ विधायकों ने सामूहिक रूप से मुख्यमंत्री से मुलाकात कर जिले की प्रशासनिक स्थिति और कलेक्टर के कामकाज को लेकर अपनी शिकायतें रखीं। कहा जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों ने विस्तार से उन मुद्दों को सामने रखा, जिनमें विकास योजनाओं की धीमी गति, स्थानीय समस्याओं के समाधान में देरी और संवादहीनता प्रमुख रही। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि विधायकों ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार महत्वपूर्ण मामलों में संपर्क करने के बावजूद उन्हें उचित प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती।
सूत्र बताते हैं कि विधायकों की सबसे बड़ी नाराजगी इस बात को लेकर है कि उनके क्षेत्रों से जुड़े विकास कार्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। कई योजनाएं कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर अपेक्षित गति दिखाई नहीं दे रही। कुछ जनप्रतिनिधियों ने कथित तौर पर यह भी कहा कि प्रशासनिक बैठकों में उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता और कई बार फोन कॉल तक का जवाब समय पर नहीं मिलता। इससे जनता के बीच उनकी छवि प्रभावित हो रही है और वे खुद को “बेबस जनप्रतिनिधि” की स्थिति में महसूस कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम ने जिले की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में नई हलचल पैदा कर दी है। जानकारों का मानना है कि जब सत्ताधारी दल के विधायक ही खुलकर नाराजगी जताने लगें, तो यह सरकार और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर संकेत माना जाता है। हालांकि अभी तक इस मामले में आधिकारिक रूप से कोई बड़ा कदम सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले समय में जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकता है।
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