दम तोड़ती जेब और गिरता रुपया: क्या मोदी सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुकी है महंगाई?

 आज हम बात कर रहे हैं उस ‘अदृश्य शत्रु’ की, जिसने भारत के हर घर की रसोई में सेंध लगा दी है। वह शत्रु है— अनियंत्रित महंगाई।

आंकड़े गवाह हैं और जनता की खाली होती जेबें चीख-चीख कर कह रही हैं कि ‘अच्छे दिन’ का सपना अब एक आर्थिक दुःस्वप्न में बदल चुका है। क्या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार केवल चुनावी रैलियों और वैश्विक मंचों पर अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है? क्योंकि धरातल पर सच्चाई यह है कि आम आदमी की थाली से दाल-रोटी भी छिनती जा रही है।

सबसे पहले बात देश की साख की। भारतीय रुपया आज अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। 18 मई 2026 को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.24 के ऐतिहासिक निचले स्तर को छू गया।

गंभीर सवाल: जब रुपया गिरता है, तो केवल एक मुद्रा नहीं गिरती, बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और सरकार की साख भी गिरती है। डॉलर का मजबूत होना और रुपये का इस कदर धराशायी होना यह दर्शाता है कि हमारी अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों के सामने कितनी असहाय है।

मई 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रिटेल महंगाई 3.47% के करीब है, लेकिन यह सरकारी आंकड़ा हकीकत को छुपा रहा है।

खाद्य महंगाई: खाने-पीने की चीजों के दाम 4.20%की दर से बढ़ रहे हैं।

परिवहन लागत: माल ढुलाई की बढ़ती कीमतों ने हर वस्तु को महंगा कर दिया है।

सिल्वर और गोल्ड: चांदी की कीमतों में 144% से अधिक की वृद्धि ने मध्यवर्गीय परिवारों के लिए निवेश के रास्ते बंद कर दिए हैं।

आम जनता पूछ रही है— क्या सरकार ने महंगाई के आगे घुटने टेक दिए हैं?

कच्चा तेल और वैश्विक कारण: सरकार हर बार अंतरराष्ट्रीय बाजार का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

मध्यम वर्ग की कमर: वेतन नहीं बढ़ रहा, लेकिन खर्च दोगुने हो गए हैं। बचत शून्य हो चुकी है और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है।

यह न्यूज़ केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि सरकार के गाल पर एक **वैचारिक तमाचा** है। जब गरीब आदमी के बच्चे दूध के लिए तरसते हैं और मध्यम वर्ग का व्यक्ति अपनी ईएमआई (EMI) भरने के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को मारता है, तब सरकार की ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘विश्वगुरु’ की बातें बेमानी लगती हैं।

 यदि समय रहते सरकार ने रुपये की गिरावट को नहीं रोका और बाजार में बढ़ती जमाखोरी व महंगाई पर लगाम नहीं लगाई, तो वह दिन दूर नहीं जब देश की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी। लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है, और जब जनता की थाली खाली होती है, तो सत्ता के सिंहासन डोलने लगते हैं।

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