
प्रदेश के एक बड़े नगर निगम में पदस्थ एक युवा आईएएस कमिश्नर इन दिनों किसी प्रशासनिक उपलब्धि या जनहितकारी फैसले के कारण नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की मेहमाननवाजी को लेकर सुर्खियों में हैं। निगम के गलियारों में चर्चा है कि जैसे ही उक्त अधिकारी के शहर आने की सूचना मिलती है, व्यवस्थाओं का पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है। उनके ठहरने के लिए शहर के सबसे महंगे और आलीशान होटलों में व्यवस्था की जाती है, जहां सामान्य कमरों के बजाय प्रीमियम या प्रेसिडेंशियल श्रेणी के सुइट बुक कराए जाने की बात कही जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, केवल आवास ही नहीं बल्कि खानपान और अन्य सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। बताया जाता है कि दिनभर की बैठकों के बाद रात्रि में विशेष आयोजनों और उच्चस्तरीय आतिथ्य की व्यवस्था की जाती है। होटल बिल, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं पर होने वाला खर्च कई बार लाखों रुपये तक पहुंचने की चर्चा निगम कार्यालयों में सुनाई देती है। हालांकि इन खर्चों का वास्तविक वहन कौन करता है, इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं और कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
नगर निगम के कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच यह भी चर्चा है कि इस तरह की व्यवस्थाओं के कारण प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकारी पदों पर बैठे अधिकारियों का सम्मान और प्रोटोकॉल अपनी जगह है, लेकिन यदि अत्यधिक खर्च और विशेष सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है तो उसकी पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को लेकर निगम के भीतर और बाहर सवाल उठने लगे हैं।
हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित अधिकारियों की ओर से भी इस विषय पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद नगर निगम के गलियारों में यह मुद्दा लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर इन कथित व्यवस्थाओं का उद्देश्य क्या है तथा इन पर होने वाले खर्च का वास्तविक स्रोत कौन है। यदि मामले में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आता है तो तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
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